भारत बाप है, मा नही

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मनी गेम

Posted On: 1 Oct, 2013  
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social issues पॉलिटिकल एक्सप्रेस बिज़नेस कोच में

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वापस जंगल की और

Posted On: 1 Oct, 2013  
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social issues पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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कीटनाशक

Posted On: 1 Oct, 2013  
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Business social issues पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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सरदार की आम की टोकरी

Posted On: 22 Jul, 2013  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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आरब स्प्रिन्ग

Posted On: 6 Jul, 2013  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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एन्काउंटर के प्रकार

Posted On: 29 Jun, 2013  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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बादल फाडा किसने ?

Posted On: 26 Jun, 2013  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

मुझे नही लगता की आज भी मानव का मानसिक विकास बच्चे के मानस से अधिक ज्यादा विकसित हो गया है । वरना धर्म की खोटी पिंजण नही करते, खोटी बहसबाजी नही करते । धर्म का हेतु समजने की कोशीश करते, धर्म का इतिहास जानने समजने की कोशीश करते, धर्म को क्यों तोडा फोडा जा रहा है, नये धर्म क्यों बन रहे हैं, धर्म को क्यों हटाया जा रहा है उन विषय पर सोचते ।-- सर्वोत्तम बात ! आदरणीय भरोदिया जी, सादर अभिवादन! बहुत दिनों बाद आप छटपटाये हैं, तिलमिलाए हैं. सोसल मीडिया से घबराए हैं. चलिए इसी बहाने आपका यहाँ दर्शन हुआ. मुझे भी यही लगता है कि धर्म को कम जाननेवाले लोग ही धर्म के ठेकेदार बन बैठे हैं तो फिर क्या होगा? धर्माचार्यों को अपना पांडित्य दिखना चाहिए, पर वे भी तो सत्ता के गलियारों में चक्कर लगाते पाये जाते हैं. बस जयादा मैं क्या कहूँ, मैं भी तो अल्पज्ञानी या मूढ़मति ही हूँ.. जय हिन्द ! जय भारत मात! सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

सुन्दर विषय .....सुन्दर लेख , आज मै एक ऐसी रचना लेकर आप सब के सामने उपस्थित हुआ हूँ, जिसे पढ़कर आप सब की आँखे नाम हो जायेगी. और यही हमारे देश की कड़वी सच्चाई भी है, इस कविता के माध्यम से मै ऋषभ शुक्ला, इस समाज का निर्दयी ही सही लेकिन है तो सच. आज हमारे समाज के लोग महिलाओ के प्रती वही पुरानी सोच रखते है जो वह हमेशा रखते आये है, और आगे भी ऐसी ही सोच रखने का इरादा है. गरीब माँ-बाप अपनी बेटियों को बोझ समझते है और वह संतान के रूप में एक बेटा चाहते है, और इसके लिए वह गर्भ में ही जाच के द्वारा उन्हें यदी पता चल गया की गर्भ में बच्ची है तो उसे इस दुनिया में आने से पहले ही मार देते है, उस नन्ही सी जान को जो इस निर्मम दुनिया में आने को बेताब रहती है, उसकी सभी इच्छाओ को भी मार देते है . मै इस कविता के माध्यम से उस छोटी गुडिया के दर्द को आप सब से मुखातिब करने का प्रयत्न कर रहा हूँ. कृपया मेरी गुजारिश है की आप सब इस लिंक को देखे और उसके बारे में कम से कम दो शब्द कहे. यदी कमेंट देने में कोई असुविधा हो तो उसे लाइक करे या वोट करे. http://rushabhshukla.jagranjunction.com/?p=25 शुक्रिया

के द्वारा: ऋषभ शुक्ला ऋषभ शुक्ला

नमस्कार जवाहरभाई भारतमें तो पहले से ही हमारे राजनेता उस के पूतले हैं । अभी ऐसा नही करेगा । अभी जो खाना खराबी करनी है उनके पूतलों द्वारा ही की जायेगी । धर्म का खातमा, हिन्दु प्रजा का खातमा, मध्यम वर्ग का खातमा, धर्म हमेशा मध्यम वर्ग के कंधों पे चलता है, मध्यम वर्ग गुलामी भी आसानीसे स्विकारता नही । मध्यम वर्ग को खतम करने के लिए इस वर्ग की सारी आर्थिक बचत को हडपना शुरु कर दिया है मेहंगाई से । मध्यम वर्ग को लूट कर गरीबों को भीख दे के बचाते रहेंगे और धनवानों को और धनवान बना दिया जायेगा । धनवनों से उनको कभी खतरा नही होता बल्के एक तरह के साथी ही बन जाते हैं । गरीब तो है ही सब की सेवा करने के लिए । १९४६ में आजादी के ९९ साल पूरे होते हैं । राजीव दिक्षित की मानें तो १९४६ में आजादी खतम हो जाती है । ९९ साल के पट्टेमे मिली थी ये जमीन । उस समय तक भारत की भूमि उनको खाली या गुलाम नगरिकों से भरी चाहीए । वसुधैव कुटुम्बकम् पढ लिजीए । सारी बात समजाने की कोशीश की है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा: सुधीर कुमार सिन्हा सुधीर कुमार सिन्हा

आदरणीय भारोदिया जी, ताज़ा घटना पर सुचिंतित विचारणीय आलेख; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! नव वर्ष की मंगल कामनाएँ ! "उन हालात में १४ जुलाई, १७८९ को लोगों का एक छोटासा ग्रूप उठा । हाथमें डंडे और हथियार उठाये, और पेरिस की और चल पडे । राज्यने शुरु शुरु में उसे बागी समज लिया और फौज को उसे कुचलने के लिए भेज दिया । लेकिन फौज के पहुंचने से पहले ही ये छोटासा ग्रूप हजारों लाखों की फौज बन चुका था । लोगों की ये फौज एक महिनेमें पेरिस पहुंच गई । घर घर की तलाशी ली और पेरिस का हर उस आदमी का गला काट दिया जो रोज शेव करता था, जो दिन में तीन बार खाना खाता था, जिस के घरमें रात के वक्त रोशनी होती थी और जीस के पास एक जोडी से ज्यादा कपडा होता था । इतिहास इस खून के खेल को फ्रान्स का रिवोल्युशन कहता है । आजादी की लडाई कहता है ।"

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

आदरणीय भारोदिया जी, एक सौ एक फीसदी सच बड़े सटीक दृष्टांत के साथ बयाँ करने वाला आलेख; हार्दिक साधुवाद एवं सदभावनाएँ ! "मैं दुसरी तरफ से देखता हुं तो भारत की जनता में ही वो जखमी गधा नजर आता है । वो गधा दर्द से चिखता रहता है लेकिन तराह तराह के गिध्ध और चीलें तूट पडती है उस पर उसे नोचने के लीए । भले उस गिध्धों की चोंच दिखाई नही देती है लेकिन बेरोजगारी-भुखमरी वाली चोंच आदमी को आखरी आरामगाह वाले अहाते में भेज देती है मरने के लिए । मेहंगाई और टेक्स की चोंच इस की पिठ की अंदर तक उतर जाती है, जो भी खून बचा है पी के बाहर निकलती है । कुछ चोंच लाठी की तरह बरसती, सिस्टम का पूरा बोजा ही लाद देती है ।"

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

सादर प्रणाम! इसी तरह चौकीदार जब चोर बन जाता है , महंत मंदिरो की सिमेंट, ईंट और सरिया बेच देता है, पोलिस डाकु बन जाती है , जज बेइन्साफी करते हैं, फौज अपने ही शहरियों को फतह करते हैं, कानून के रखवाले कनून तोडने लगते हैं, नेता राजनीति को कारोबार बना लेते हैं और जनता देश को लूटते, बारबाद होते, खराब होते देखती रहती है, तो समस्या ही पैदा होती है । और हमारे देश के साथ यही हो रहा है । इस देश को उस की बाड खा रही है, उस के चौकीदार चोर बन चुके हैं, और देश का मालिक याने जनता मुह देख रही है, उसका अंदर का जखम गेहराता जा रहा है ।....................................आपकी साडी बातों से सहमत हूँ सिवाय "देश का मालिक याने जनता मुह देख रही है, उसका अंदर का जखम गेहराता जा रहा है " क्योंकि साडी व्यवस्थाओं में अव्यवस्था फ़ैलाने की जड़ इस जनता का "स्वार्थ" कभी इससे ऊपर उठाकर तो देखे..............

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा: अन्जानी- अनिल अन्जानी- अनिल

के द्वारा: bharodiya bharodiya

अशोक भाई नमस्कार बहुत परेशान करती है अपने मां बाप को । कितने लायक लडके हो सकते हैं उन के सर्कल में ? ३० ? ४० ? ६० ? कभी लडका मना करता है कभी लडकी । एक बाप की नजर से सोचोगे तो आप को ये पूर्वाग्रह नही लगेगा । कोइ कोइ तो ३०-३२ की हो जाती है । फिर गीरती है खाई में । अपनी हैसियत के बाहर डिमांड करना मुर्खता ही है । मुझे मराठी प्रजा खुद्दर प्रजा लगती है, मैंने कभी नही सुना की कोइ मराठी परीवार ने अपने लडकी की शादी में पैसे लिए हो । आपने सुना है तो जरूर कीसीने मजबूरी में लिये हो । गुजराती लडकों मे वो तीन चीज देखते हैं । दहेज का झंझट नही(गरीबों की बडी समस्या यही है) , धन्धे रोजगार में दूसरों को मात दे देते है, और शराब से दूर रहते हैं (खास कर लडकी की मां दारु से तंग होती है )। बदमाश लडके पी लेते हैं वो अपवाद है । अच्छे बूरे परिणाम तो सब तरह की शादी का होता है । ईस का कोइ अलग, एक्ष्ट्रा बूरा परिणाम नही होता ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

भारोडिया जी भाई नमस्कार, आप गुजरात की लड़कियों को लेकर पूर्वाग्रहग्रस्त मालुम पड़ते हैं. सभी लडकियां अपने लिए उपयुक्त वर की ही तलाश करती हैं और लडके भी अपने लिए सुन्दरतम लड़की खोजने में कहीं पीछे नहीं दिखते. जाति में शादी के अब कोई बहुत मायने नहीं रह गए हैं जब से विदेशों में नौकरी करने वालों की तादाद में इजाफा हुआ है तबसे अंतरजातीय विवाहों की बाढ़ सी आ गयी है. लड़कियों की कमी से प्रायः सभी राज्य गुजर रहे हैं. महाराष्ट्र के गरीब तबके से बड़ी संख्या में रुपये लेकर लड़कियों को दूर प्रदेश में ब्याहने का कार्य पिछले कुछ वर्षों से जोर पकड़ रहा है. हमेशा परिणाम अच्छे ही आयेंगे ऐसा सोचना भी बेईमानी हैं.

के द्वारा: akraktale akraktale

दिनेश भाई, जवाहर भाई, डॉ साहब और अल्का बहन आप सब को प्रणाम मुझे गुजरात की समस्या मालुम थी और पंजाब के बारेमें सुना था, स्योर नही था । मेरा लेख सिर्फ गुजरात की समस्या को लेकर था । अब जब आप लोगों के माध्यम से मालुम पडा है ये समस्या सर्वव्यापी है और बढने वाली है तो मेरा ये लेख खारिज हो जाता है । क्यों की सब राज्यों को लडकियों की कमी सताती होगी और और सतायेगी । अब ईस समस्या की जड पर सोचना चाहिए । ईस की जड है लडकों की चाहत । और ये सनातन है । आसानीसे बदलनेवाली नही है । और आदमी की ये चाहत गलत भी नही है । भारत में बुढे मां बाप की जिम्मेदारी लडकों पर होती है । कौन सा आदमी लडका नही चाहेगा । ईस जड का समाधान सरकार ही कर सकती है, वयस्कों की जिम्मेदारी ले कर । भले सरकार उस वयस्क की संपत्ती, अगर हो, अपने नाम करले । लेकिन एक अच्छा बेटा तो सरकार को ही बनना पडेगा । अगर ऐसा होता है तो बहुत ही फर्क पड जायेगा । लोगों का रवैया बदल सकता है । बाकी तो डॉक्टरों को दंडित करने से या बेटा बेटी समान है, ऐसे नारों से कुछ होनेवाला नही है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

वासुदेव भाई नमस्कार मैं रहता हुं उस इलाके में भी एक बस्ती है । रिक्षावाला को कहो की बंगला देश जाना है वो ले जाता है । एक संख्या से नाम ही बंगलादेश पड जाये, सिर्फ एक उपनगर में तो पूरे शहर, राज्य या देशमे कितनी संख्या होगी । और भारत तो दुकान ही है ना । ईस दुकान में २०० से २००० में राशन कार्ड मिल जाता है । बाद में तो जीतनी भी आई.डी बनाना हो बना लो । आई.डी का सबसे बडा दुरुपयोग घुस पैठ में हुआ है । ये कागज का बाघ बना रहता है जबतक असली और जमिनी कानून का सही तरह उपयोग ना हो । सरकार मान कर चलती है की ये लोग शुध्ध रूप से हमारे ही मतदाता है । मूल भारतवासी हमारे वफादर नही है, विरोध पार्टी को वोट दे सकते है । सरकार तो हमसे ज्यादा उन का ही जतन करेगी ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

राजकमलभाई नमस्ते आई.डी का जहां फायदा है वो हम जानते हैं लेकिन जहां नूकसान है वो मैं बताता हुं । बेंकिंग में फायदा भी है नूकसान भी । फायदा ये है की कोइ घपला कर के भाग नही सकता । नूकसान ये है की जाली आई.डी का उपयोग कर के घपलेबाज खाता खोलते हैं और घपला कर देते हैं । ईन्टरनेट बेंकिन्ग आज खतरे में पड गया है आई.डी के कारण । ग्राहकों की आई.डी आम हो गई है, ईन्टरनेट के चोर-बाजारमे सारे डेटा बिक रहे हैं । बेंक वाले मानने के लिये तयार नही है । चोर अपने पास रहे डेटा का उपयोग करते हुए खाता का नया पासवर्ड मांगता है, ओन्लाईन ही । तीन ही चीज सच पड जाये तो पासवर्ड मिल जाता है । खाता नम्बर, पॅन नम्बर और जनम तारिख । हो गया कल्याण ? लोग रोजी रोटी के लिए बडे शहरों में जाते हैं । दुसरे शहर का पता नही मुंबई की बात करुन्गा । यहां रोजी रोटी के लिये आये हुए लोक शरुआत में अकेली जान होते हैं । किसी के सहारे किसी के साथ रहता है । काम मिलने पर भाडे का घर देखता है । यहां अनलिखा रुल है की किरायेदार का फोटो और आई.डी पूलिस में जमा कराओ । लेकिन यहां तकलिफ हो जाती है । भाडे के मकान के रुल भी थोडे विचित्र है, ११ महिने से ज्यादा कोइ भाडे पे नही देता । और कोई मकान मालिक ये नही चाहेगा ही की उन का भाडुत रेशन कार्ड आदी कोइ प्रूफ बनाले उस मकान को ले के । कोइ लालची भाडुत मिल जाता है तो मकान खाली करने में तकलिफ होती है । ११ महिने से ज्यादा समय आई.डी प्रूफ के साथ किसी को रहने देना खतरनाक था एक समय । आज मकान हडपने के किस्से नही होते हैं । लेकिन फिर भी लोग सवधान है । पूलिस भी आदमी ही है वो सब समजते है ईस लिये अपनी बात पर वो जोर नही देते । चलता है बीना आई.डी. फोटो और नाम से काम चल जाता है, लोग वो बी नही देते । दिनेश भाई नमस्कार राजकमल भाई ने विमान सेवा की बात कही । सबसे ज्यादा खतरा हाईजेक होने का है । आई.डी से भी ज्यादा हथियार का ध्यान रखना पडता है । बुरा काम करने वाले ऐसी आई.डी. तैयार करके लाते हैं की असली है या नकली पहचानना मुश्किल हो जाता है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

भरोडिया जी भाई, सादर, इन्टरनेट पर रेलवे की आरक्षित टिकिट प्राप्त करने के लिए आय डी की आवशयकता होती है इससे आप घर बैठे टिकिट प्राप्त करते हैं और आरक्षण कार्यालय जाकर लम्बी लम्बी कतारों में लगने से बच पाते हैं. आय डी के रूप में पेन कार्ड के उपयोग के कारण ही आज आयकर विभाग घर बैठे टैक्स रिटर्न्स फ़ाइल करवा रहा है. जिसके कारण अवकाश लेकर आयकर कार्यालय की कतारों से मुक्ति मिलती है. मैंने ये दो उदाहरण इसलिए दिए हैं की आप लिख तो आय डी रहे हैं किन्तु बात सिर्फ फोटो आय डी की कर रहे हैं. आय डी मांगे जाने को आप जहां गुलामी जैसा महसूस कर रहे हैं वह कतई भी उचित नहीं है क्योंकि हर विशेष कार्यक्रम में फोटो आय डी गले में लटकाए हुए आपने वहां के सभी आगंतुकों को देखा होगा यह एक अच्छी सुविधा है इसे अन्यथा नहीं लिया जा सकता. धन्यवाद.

के द्वारा: akraktale akraktale

प्रिय भ्रोदिया जी ..... सप्रेम नमस्कारम ! मैं ऐसी चैकिंग के हक में हूँ ..... अमेरिकी इस मामले में दूसरे देश के भूतपूर्व राष्ट्रपति (कलाम )और सत्तासीन ग्रहमंत्री(फर्नाडीज ) और शाहरूख तक का लिहाज नहीं करते है .... बेशक रेल और हवाईयन चैकिंग के अलग मापदण्ड है लेकिन बात अपने असूलो पर चलते हुए नियम और कायदे कानूनों का सख्ती से पालन करने की है .... जब सवाल हजारों जिन्दगानियो की सुरक्षा से जुड़ा हुआ हो तो हमे यथा संभव सहयोग देते हुए थोड़ा बहुत कष्ट सहने के लिए भी खुद को तैयार रखना चाहिए :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-? :-x :-) :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-P :-? :-x :-) :evil: ;-) :-D :-o :-( :-D :evil: ;-) :-D :mrgreen: :-? :-x :-) : :roll: :oops: :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P जय श्री कृष्ण जी

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

अशोकभाई आप की बात असम सरकारने सुन ली है । अब हमे कोइ फरियाद नही है । ये दैनिक भास्कर का पूरा लेख है । गुवाहाटी में बुधवार को पूर्वोत्तर भारत के 'सांस्कृतिक दूत' कहे जाने वाले मशहूर संगीतकार, गीतकार और गायक डॉ. भूपेन हजारिका का अंतिम संस्कार किया जाएगा। असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने यह घोषणा की है। असम और अरुणाचल प्रदेश सरकार ने हजारिका के सम्मान में राजकीय अवकाश भी घोषित किया है। डॉ. हजारिका को उनके पुत्र मुखाग्नि देंगे जो अमेरिका से गुवाहाटी पहुंच रहे हैं। तेज अपनी मां प्रियंवदा के साथ अमेरिका में ही रहते हैं। तबियत खराब होने की वजह से प्रियंवदा भारत नहीं आएंगी। डॉ. हजारिका का पार्थिव शरीर गुवाहाटी विश्वविद्यालय के प्रांगण में रखा गया है, जहां आज बड़ी तादाद में विश्वविद्यालय और आसपास के कॉलेज के छात्र बड़ी तादाद में डॉ. हजारिका के अंतिम दर्शन के लिए उमड़ रहे हैं। भीड़ के चलते छात्रों को कई घंटों तक इंतजार करना पड़ रहा है। दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित डॉ. हजारिका गुवाहाटी विश्वविद्यालय में अध्यापन भी कर चुके हैं। यही वजह है कि विश्वविद्यालय का झंडा उनके प्रति सम्मान में आधा झुका हुआ है। गुवाहाटी विश्वविद्यालय में आ रहे छात्रों का कहना है कि डॉ. हजारिका ने असम के युवाओं को एकता के सूत्र में पिरोया। इससे पहले सोमवार को असम की जनता ने अपने 'सांस्कृतिक नायक' के अंतिम दर्शन नम आंखों से किए। दोपहर में डॉ. हजारिका का पार्थिव शरीर मुंबई से गुवाहाटी एयरपोर्ट पहुंचा। एयरपोर्ट से हजारिका के निजरापार में मौजूद घर तक 25 किलोमीटर के रास्ते में लोगों का तांता लगा रहा है। डॉ. हजारिका के चाहने वाले उनके पार्थिव शरीर पर फूल और असम का मशहूर गमछा अर्पित कर रहे थे। गुवाहाटी में हजारिका की शवयात्रा के दौरान कई लोग अपने जज्बातों पर काबू नहीं रख पा रहे थे और डॉ. हजारिका के प्रति उनका लगाव और आदर आंसुओं के रूप में आंखों से बह रहा था। उनके कई प्रशंसकों ने डॉ. हजारिका के गीत गाकर उन्हें आखिरी विदाई दी। हजारिका का पार्थिव शरीर निजरापार में मौजूद उनके पैतृक घर पर भी काफी देर रखा गया। डॉ. हजारिका का बीते शनिवार को मुंबई के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया था।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

आदरणीय भरोडिया भाई नमस्कार, आपने मंच के माध्यम से आदरणीय भूपेन हजारिका जी को जो श्रधांजलि दिलवाई है वह बहुत ही सराहनीय कार्य किया है. मै भी इस मंच और आपके ब्लॉग के माध्यम से भूपेन जी को श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ. मगर दुःख होता है की एक दादा साहब फाल्के पुरस्कार विजेता महान गायक,गीतकार और संगीतकार को सरकारी तौर पर जो श्रद्धांजलि मिलना चाहिए थी वह नहीं मिली. हिंदी गीतों की गायकी में तो हजारिका जी को श्री गुलजार साहब लाये थे उन्ही ने उनके आसमिया गीतों को हिंदी रुपान्तार्ण किया था.जबकि उनके असमिया गीत जो लोहित नदी पर गाये है भाषा न समझ आये फिरभी उनको सुनकर मन हर्षित हो जाता है.आभार.

के द्वारा: akraktale akraktale

चातकभाई नमस्ते माया और हम लगभग एक ही समय एक ही सयकल पर बैठे थे । शून्य आंकडे का उपयोग ईस की साबीती है । माया ने भी शून्य का अच्छी तरह उपयोग किया है । उस समय कोई साधन नही थे एक दुसरे के मेले मिलाप के । हम एक दुसरे को सिखा दे ऐसे रास्ते थे ही नही । उन का बडा सायकल और हमारे बडे सायकल ने अंतर नही है । ईसे हम ने क्वोलिटी वाईज, सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलयुग में विभाजित किया है । ये चार युग पसार होते है तब हमारा बडा सायकल पूरा होता है । आज खराब क्वोलिटी वाला कलयुग का हिस्सा चल रहा है । हमारे पास तारिख नही है लेकिन ये हिस्सा पूरा होते सयकल सतयुग से रिपीट होगा । कलयुग की कुटिलता और सतयुग की सज्जनता के बीच बडी खाई है । विनाश और नवसर्जन के सिवा कोई चारा नही । हमारे और उन के सायकल का पूरा होने का समय लगभग एक साथ हो गया है । ये कोई अकस्मात नही है । कुछ तो राज है जो हम नही समज सकते ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

अशोकभाई मैने हिन्दी और अंग्रेजी की स्पर्धा बताई है । और कुछ लोग को हिन्दी के गीरते स्तर का दर्द है, उसे मिटाने की कोशीश की है । हिन्दी अपने बलबूते पर भारत के तीन कोने तक पहुंच ही गई है । निचे एक कोना ( दक्षिण ) बाकी है वो तो बाकी ही रहेगा । हिन्दी एक लिपी या शब्द तक सिमित नही एक जीवन शैली भी बन चुकी है । पाकिस्तान को हिन्दी फिल्म उद्योग अपना ही लगता है वो हिन्दी और जीवन शैली के कारण । दुनिया के दुसरे बहुत से देशों में हिन्दी फिल्में जाती है । वहा सब हिन्दी नही जानते । वहा अपनी भाषा डब करवाते है । दिन्दी तो डब हो जाती है हिन्द की जीवन शैली नही । आज हिन्दी भारत की महाभाषा है । बडी भाषा का शब्दकोष बडा बन जाता है । जब अन्ग्रेजी भी बीस तहर की बोली जाती है दुनिया में तो २५ तरह की हिन्दी क्यो नही । हिन्दी का चालक आज साहित्यकार नही, बोलने और सुनने वाले लोग है । साहित्यकारों के शब्द नागरिक नही साहित्यकार ही समज सकता है । और नागरिकों के पास समय भी नही है । नए साहित्यकार समज गये हैं और नागरिकों के पीछे चल पडे हैं । अपनी जीद में कोई हिन्दी को चलाना चाहेगा तो वो खूद पीछे छुट जाएगा हिन्दी आगे बढ जायेगी । ... व्याकरण नामकी चीज तो हर भाषा को परेशान करती है । येही चीज भाषा को दुसरों तक जाने से तोकती है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya




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