भारत बाप है, मा नही

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bharodiya


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मनी गेम

Posted On: 1 Oct, 2013  
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social issues पॉलिटिकल एक्सप्रेस बिज़नेस कोच में

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वापस जंगल की और

Posted On: 1 Oct, 2013  
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social issues पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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कीटनाशक

Posted On: 1 Oct, 2013  
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Business social issues पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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सरदार की आम की टोकरी

Posted On: 22 Jul, 2013  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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फोर्मेट ईन्डिया

Posted On: 6 Jul, 2013  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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आरब स्प्रिन्ग

Posted On: 6 Jul, 2013  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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एन्काउंटर के प्रकार

Posted On: 29 Jun, 2013  
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पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

मुझे नही लगता की आज भी मानव का मानसिक विकास बच्चे के मानस से अधिक ज्यादा विकसित हो गया है । वरना धर्म की खोटी पिंजण नही करते, खोटी बहसबाजी नही करते । धर्म का हेतु समजने की कोशीश करते, धर्म का इतिहास जानने समजने की कोशीश करते, धर्म को क्यों तोडा फोडा जा रहा है, नये धर्म क्यों बन रहे हैं, धर्म को क्यों हटाया जा रहा है उन विषय पर सोचते ।-- सर्वोत्तम बात ! आदरणीय भरोदिया जी, सादर अभिवादन! बहुत दिनों बाद आप छटपटाये हैं, तिलमिलाए हैं. सोसल मीडिया से घबराए हैं. चलिए इसी बहाने आपका यहाँ दर्शन हुआ. मुझे भी यही लगता है कि धर्म को कम जाननेवाले लोग ही धर्म के ठेकेदार बन बैठे हैं तो फिर क्या होगा? धर्माचार्यों को अपना पांडित्य दिखना चाहिए, पर वे भी तो सत्ता के गलियारों में चक्कर लगाते पाये जाते हैं. बस जयादा मैं क्या कहूँ, मैं भी तो अल्पज्ञानी या मूढ़मति ही हूँ.. जय हिन्द ! जय भारत मात! सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

फेसबूक या दूसरी सोसियल साईटमें बैठे हमारे जैसे लाखों ऍन्टिवायरस है लेकिन वो सब छोटे छोटे हैं । अगर सब एक हो जाते हैं और पूरे इडिया को फोर्मेट मार के वापस प्रोग्राम इन्स्टोल कर के भारत बना देते हैं, तो देश अपनी रफ्तार पकडेगा वरना स्लो इन्डिया में करप्ट या डिलिट होने के लिए तैयार रहना होगा ।.... ....प्रणाम सर! आपने कितने विषयों में डॉक्टरेट की है? समझाने का तरीका ...... मास्सल्लाह! मैंने आपको एक बार प्रोफ़ेसर की उपाधि दी थी अब 'डॉक्टरेट' की दे रहा हूँ. ले लीजिये भाई,... हम आम जनता है! ...हम ही तो सरकार बनाते है गिरते हैं, ....फोर्मेट भी कर देंगे! .....पर एक चीज सर ब्यक्तिगत रूप से कान में कहना चाहता हूँ - "अमरीका से कोई जाती दुश्मनी?" बादल फाड़ने के लिए भी अपने अमरीका को पकड़ा, अब माउस अमरीका हाथों से छीनना कहते हैं! आप रात भर सोते नहीं शुबह सबसे पहले जग जाते हैं जग कर ही माउस और की बोर्ड सम्हाल लेते हैं! आपको पारिश्रमिक कौन देता है सर जी? आपने राजीव दीक्षित का नाम लिया था वे तो अब इस दुनियां में नहीं हैं आप उनका कार्य भाल सम्हालिए प्रभु! बोलिए तो बाबा रामदेव के दरबार में एक अप्लिकेसन फेंक आऊँ ....... सादर ... बुरा न मानिये, कुछ बातें मजाक में कह रहा हूँ .... आपका आलेख पढ़ कर पहले जी भरकर हंसा भी हूँ.... इस उम्मीद से की छोटे भाई समझ के माफ़ कर दीजियेगा!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

सुन्दर विषय .....सुन्दर लेख , आज मै एक ऐसी रचना लेकर आप सब के सामने उपस्थित हुआ हूँ, जिसे पढ़कर आप सब की आँखे नाम हो जायेगी. और यही हमारे देश की कड़वी सच्चाई भी है, इस कविता के माध्यम से मै ऋषभ शुक्ला, इस समाज का निर्दयी ही सही लेकिन है तो सच. आज हमारे समाज के लोग महिलाओ के प्रती वही पुरानी सोच रखते है जो वह हमेशा रखते आये है, और आगे भी ऐसी ही सोच रखने का इरादा है. गरीब माँ-बाप अपनी बेटियों को बोझ समझते है और वह संतान के रूप में एक बेटा चाहते है, और इसके लिए वह गर्भ में ही जाच के द्वारा उन्हें यदी पता चल गया की गर्भ में बच्ची है तो उसे इस दुनिया में आने से पहले ही मार देते है, उस नन्ही सी जान को जो इस निर्मम दुनिया में आने को बेताब रहती है, उसकी सभी इच्छाओ को भी मार देते है . मै इस कविता के माध्यम से उस छोटी गुडिया के दर्द को आप सब से मुखातिब करने का प्रयत्न कर रहा हूँ. कृपया मेरी गुजारिश है की आप सब इस लिंक को देखे और उसके बारे में कम से कम दो शब्द कहे. यदी कमेंट देने में कोई असुविधा हो तो उसे लाइक करे या वोट करे. http://rushabhshukla.jagranjunction.com/?p=25 शुक्रिया

के द्वारा: ऋषभ शुक्ला ऋषभ शुक्ला

नमस्कार जवाहरभाई भारतमें तो पहले से ही हमारे राजनेता उस के पूतले हैं । अभी ऐसा नही करेगा । अभी जो खाना खराबी करनी है उनके पूतलों द्वारा ही की जायेगी । धर्म का खातमा, हिन्दु प्रजा का खातमा, मध्यम वर्ग का खातमा, धर्म हमेशा मध्यम वर्ग के कंधों पे चलता है, मध्यम वर्ग गुलामी भी आसानीसे स्विकारता नही । मध्यम वर्ग को खतम करने के लिए इस वर्ग की सारी आर्थिक बचत को हडपना शुरु कर दिया है मेहंगाई से । मध्यम वर्ग को लूट कर गरीबों को भीख दे के बचाते रहेंगे और धनवानों को और धनवान बना दिया जायेगा । धनवनों से उनको कभी खतरा नही होता बल्के एक तरह के साथी ही बन जाते हैं । गरीब तो है ही सब की सेवा करने के लिए । १९४६ में आजादी के ९९ साल पूरे होते हैं । राजीव दिक्षित की मानें तो १९४६ में आजादी खतम हो जाती है । ९९ साल के पट्टेमे मिली थी ये जमीन । उस समय तक भारत की भूमि उनको खाली या गुलाम नगरिकों से भरी चाहीए । वसुधैव कुटुम्बकम् पढ लिजीए । सारी बात समजाने की कोशीश की है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा: bharodiya bharodiya

एक बिलकुल अलग तरह के लेखन के लिए बधाई ! ये हकीकत है की हम जैसे देश के लोग जाने अनजाने ब्रिटेन के कब्जे में ही हैं !इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग में एक कांसेप्ट होता है ABC ! यानी ऑलवेज बेटर कण्ट्रोल ! यानी की बहुत महँगी चीज कम संख्या में , उससे कम महँगी थोड़ी ज्यादा संख्या में और बिलकुल सस्ती चीज़ बहुत ज्यादा संख्या में ! हम शायद C में आते हैं और वो शायद A में ! हम १२० करोड़ से भी ज्यादा अपने पेट और अपने बच्चों के पेट से ज्यादा कुछ सोच ही नहीं पाते की क्या गलत और क्या सही ? लेकिन जैसे की आपने आखिर में लिखा है विरोध शुरू तो हुआ ही है ? इल्लुमिनिटी का विरोध करने किल्ल्युमिनिटी वाले मैदानमें आ गये हैं । ये लोग विश्वभरमें फैले हुए हैं, अपने अपने देश को वापस ब्रिटन के ताज के निचे नही आने देना चाहते हैं, अपने धर्म और संस्कार नही छोडना चाहते हैं । उन की मददमें एक हेकर ग्रूप सामने आ गया है जो कोम्प्युटर के मास्टर्स है और उन जालिमों की कंपनियों, उनकी बेंकों के नेटवर्क को खराब कर देते हैं ।

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: सुधीर कुमार सिन्हा सुधीर कुमार सिन्हा

आदरणीय भारोदिया जी, ताज़ा घटना पर सुचिंतित विचारणीय आलेख; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! नव वर्ष की मंगल कामनाएँ ! "उन हालात में १४ जुलाई, १७८९ को लोगों का एक छोटासा ग्रूप उठा । हाथमें डंडे और हथियार उठाये, और पेरिस की और चल पडे । राज्यने शुरु शुरु में उसे बागी समज लिया और फौज को उसे कुचलने के लिए भेज दिया । लेकिन फौज के पहुंचने से पहले ही ये छोटासा ग्रूप हजारों लाखों की फौज बन चुका था । लोगों की ये फौज एक महिनेमें पेरिस पहुंच गई । घर घर की तलाशी ली और पेरिस का हर उस आदमी का गला काट दिया जो रोज शेव करता था, जो दिन में तीन बार खाना खाता था, जिस के घरमें रात के वक्त रोशनी होती थी और जीस के पास एक जोडी से ज्यादा कपडा होता था । इतिहास इस खून के खेल को फ्रान्स का रिवोल्युशन कहता है । आजादी की लडाई कहता है ।"

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

आदरणीय भारोदिया जी, एक सौ एक फीसदी सच बड़े सटीक दृष्टांत के साथ बयाँ करने वाला आलेख; हार्दिक साधुवाद एवं सदभावनाएँ ! "मैं दुसरी तरफ से देखता हुं तो भारत की जनता में ही वो जखमी गधा नजर आता है । वो गधा दर्द से चिखता रहता है लेकिन तराह तराह के गिध्ध और चीलें तूट पडती है उस पर उसे नोचने के लीए । भले उस गिध्धों की चोंच दिखाई नही देती है लेकिन बेरोजगारी-भुखमरी वाली चोंच आदमी को आखरी आरामगाह वाले अहाते में भेज देती है मरने के लिए । मेहंगाई और टेक्स की चोंच इस की पिठ की अंदर तक उतर जाती है, जो भी खून बचा है पी के बाहर निकलती है । कुछ चोंच लाठी की तरह बरसती, सिस्टम का पूरा बोजा ही लाद देती है ।"

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

सादर प्रणाम! इसी तरह चौकीदार जब चोर बन जाता है , महंत मंदिरो की सिमेंट, ईंट और सरिया बेच देता है, पोलिस डाकु बन जाती है , जज बेइन्साफी करते हैं, फौज अपने ही शहरियों को फतह करते हैं, कानून के रखवाले कनून तोडने लगते हैं, नेता राजनीति को कारोबार बना लेते हैं और जनता देश को लूटते, बारबाद होते, खराब होते देखती रहती है, तो समस्या ही पैदा होती है । और हमारे देश के साथ यही हो रहा है । इस देश को उस की बाड खा रही है, उस के चौकीदार चोर बन चुके हैं, और देश का मालिक याने जनता मुह देख रही है, उसका अंदर का जखम गेहराता जा रहा है ।....................................आपकी साडी बातों से सहमत हूँ सिवाय "देश का मालिक याने जनता मुह देख रही है, उसका अंदर का जखम गेहराता जा रहा है " क्योंकि साडी व्यवस्थाओं में अव्यवस्था फ़ैलाने की जड़ इस जनता का "स्वार्थ" कभी इससे ऊपर उठाकर तो देखे..............

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: bharodiya bharodiya

नमस्कार डो.साहब जब तक मोदी का नाम नही हुआ था तब तक मोदी लापता थे अपनों के लिए । दोनो का निचला मध्धम वर्गी परिवार क्या करे ? कहां ढुंढे मोदी को ? और बेरोजगार आदमीको ढुंढ के भी क्या फायदा ? नसिब पर छोड दिया भाभी को । कभी तो आयेगा । भाभी को भी ज्ञात हो गया थी ये आदमी कुछ ना कुछ अच्छा कर रहा है । उसने सब को कह दिया की मोदी से उन्हें अलग करने की कोशीश ना की जाये । और जब पति का नाम हुआ तो कौन ऐसी भारतिय नारी होगी जो अपने पति को छोडने की सोचे ? भाभी की महानता उसमें है की मोदी पर साथ रहने के लिए प्रेशर नही डाला । मोदी को बंधन मुक्त खूला छोड दिया उस के लक्ष को पाने के लिए । भाभी को अब कहां तकलीफ है ! पूरे गुजरात की हिरोइन (फस्ट लेडी) बन गई है । बालविवाह के चक्कर में ये सब हो गया । बीच में लोगों की भावना थी की मोदी कम से कम अपनी माता जी और भाभी जी को अपने पास रख्खे । लेकिन मोदी के आगे सब चुप है । मोदीने कह दिया सोने से पहले मेरे हाथमें फाईल होती है । हो गया कल्याण ? सब की भावना का ? ये अर्जुन है, उसे मछली की एक ही आंख दिखती है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा: bharodiya bharodiya

आदरणीय भरोदिया जी , नमस्कार ये भारत भूमि में ही होता है की सच्चे दिल से मातृभूमि से प्रेम हो जाता है तब खून और सिंदूर के रिश्ते तक सिमित नहीं होता उसके लिए पूरा देश ही अपना सगा हो जाता है और वो इंसान अपना व्यक्तिगत जीवन से बहुत ही ऊपर उठ जाता है .. जो आम इंसान के समझ से परे है .. नरेंद्र मोदी जी और जसोदा भाभी का त्याग और देश के प्रति असीम प्रेम को मेरा नमन .. आम आदमी इसे नहीं समझ सकता .. इसलिए वो या तो इस तरह के लोगो की खिल्ली उड़ने लगत है और जब समझ में आता है तो पूजा करने लग जाता है ..... हमारे समाज में ऐसे असंख्य उदहारण है ... वतर्मान में अटल जी , भूतपूर्व राट्रपति अब्दुल कलाम .. ये कुछ जाने पहचाने नाम है इसके अलावे कितने अनाम लोग वर्तमान समय में उच्च उदेश के लिए सब त्याग कर लगे हुए हैं जो सामने नहीं आते और हम जानते भी नहीं ... नरेंद मोदी चुकी राजनीति में है ... और आज राजनीति किसी को भी कीचड़ में घसीटने से बाज नहीं आती .... अतः ये सब चलता रहेगा .... आपको बहुत-२ बधाई .. एक सच्चे ह्रदयस्पर्शी आलेख के लिए

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

के द्वारा: bharodiya bharodiya

पारिस्थितिक दृष्टिकोण पर आधारित पठनीय आलेख; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! "लेकिन इस दौरान ये पतिपत्नी समाज से आगे बढ गए । भाभीने ठान लिया की मैं तलाक नही लुंगी । मरते दमतक नरेन्द्र ही मेरा पति रहेगा । और नरेन्द्रभाई भी मजबूर है । देश सेवा का ईतना बडा भार उठा लिया है की २४ घंटे में से ५ मिनट भी वो भाभी या अन्य सगे को नही दे सकते । भाभी भी ये समज चुकी है । देश के लिये आदमी मर जाता है तो ये तो सिर्फ पति का वियोग ही है । xxx xxx xxx अपने घर संसार की बली, भाभी जी के अरमानों की बली, अपने ही संबंधियो से बेरुखी । ये सब नरेंद्र मोदीने किया है । उनका केरेक्टर ढिला है या मजबूत तय जनता करगी, कोंग्रेस या दिग्गी राजा नही । नरेंद्रभाई आज जीस स्थान पर खडे हैं उन के पिछे वो पतिपत्नि का त्याग बहुत बडी भुमिका निभा चुका है । उन के निजी जीवन में हमारा कोइ अधिकार नही बनता दखल देने का ।"

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

के द्वारा: bharodiya bharodiya

पिचले लेख पर कमेन्ट नहीं कर पा रहा हूँ सो यहाँ लिख रहा हूँ,भरोदिया जी हमारे यहाँ उकरडा को घूर बोलते है .. दीपावली पर वह पर एक दिन पहले से ही दिया जलाया जाता है.. मेरे पिता जी आयुर्वेदिक डॉक्टर है , मैं एम् बी बी एस और मेरे बड़े भाई एम् बी बी एस करके बी एच यु से एम् डी कर रहे है .. पर पिता जी के संस्कार की वजह से आज भी घर पर यदि रहते है तो ये नियम है की रस्ते की सफाई हामी तीनो में से किसी एक को करनी है , कम से कम ५० मीटर , किसी कर्मचारी का इंतज़ार नहीं ... और होली के समय गाव की परंपरा के अनुसार पुरे नाली की भी सफाई सबको मिलकर करनी होती है.. पर हमारे यहाँ कुछ जगहों पर जाहिल लोग कुछ विशेष लोगो से ही यह कार्य जबरदस्ती करते है.. इसको तो मै गलत मानता हूँ.. लेकिन खाद बनाकर खेत में डालने का फायदा तो अपरम्पार है..

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

निशाबहन नमस्कार हमारे पास भी ऐसी शख्सियत थी श्री लाल बहादूर शास्त्री । उनका जीवन ऐसा ही था । एक प्रसंग बताता हु । एक बार वो निजी काम के लिये घोडागाडीमे बैठ कर कहीं गये थे । उतरने के बाद डेढ रुपिया थमा दिया घोडागाडीवाले को । घोडागाडीवाला नही माना उसने दो रुपये मांगे । शास्त्री को मालुम था की डेढ रुपिया ही होता है और वो आठ आना ज्यादा मांगता है । कैसे दे दे ? बहस हुई । लोगों का ध्यान गया । लोगोंने पहचान लिया ये तो हमारे प्रधान मंत्री है । घोडागाडीवाला भी शरमा गया, साहब साहब कर के पांव में पडने लगा और भाडा लेने से ईन्कार करने लगा । लेकिन शास्त्री ने डेढ रुपिया दे ही दिया । वो पहले और आखरी नेता थे जो भारत का नाथ नही सेवक थे, गरीब सेवक । लेकिन हम उसे बचा नही पाये । साजीश के शिकार हो गए ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा: अन्जानी- अनिल अन्जानी- अनिल

के द्वारा: bharodiya bharodiya

नमक हो टाटा का टाटा नमक टाटा का मैं फैन हूँ लेकिन जब उनकी इस नमकहलाली के धन्धे में एंट्री हुई तो सभी यही सोच रहे थे की टाटा ने नमक को भी नहीं है छोड़ा पच्चास पैसे वाली नमक की थैली भी अब टाटा कम्पनी बेचेगी हमारे साथ -२ पूरी दुनिया ने देखा की जब एक बड़ा व्यपारिक घराना किसी छोटी से छोटी वस्तु के व्यपार में हाथ डालता है तो वोह भी बड़ी हो जाती है कम से कम दाम के मामले में तो बेहतरीन लेख पर मुबारकबाद :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-? :-x :-) :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-P :-? :-x :-) :evil: ;-) :-D :-o :-( :-D :evil: ;-) :-D :mrgreen: :-? :-x :-) : :roll: :oops: :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) जय श्री कृष्ण जी+ जय हो मुनिश्री तरुण सागर जी

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

मोहिन्दर भाई नमस्कार और आप का स्वागत है । आप को शादीका मामला गंभीर न लगता हो लेकिन कुदरत और समाज की द्रष्टिसे गंभीर है । कुदरत शादी का समय बता देता है और समाज शादी करवा देता है । दोनों चाहते हैं की मानव जाती बच्चे पैदा कर के मानव जाती को बचाए रख्खे । शादी जीवन ही एक रास्ता है । शादी का तरिका कोइ भी हो किसी में बुराई नही है । मैंने सिर्फ कोशीश की है --पराई शब्द की मायाजाल को तोडने की --। अरेंज मेरेज में अब लडके लडकी की मरजी ही चलती है । बराबर बात है । पहले तो पूछा तक नही जाता था । ईतना सुधार तो आया है । लेकिन ईस से माबाप परेशान हो गये है, कितने रिश्ते दिखाए । लडका लडकी ठुकरा देते हैं एक दुसरे को । थक कर पूछा भी जाता है कोइ पात्र पसंद किया हो तो नाम बोलो उस से शादी करवा देते है । लेकिन बच्चे ना ही बोल देते हैं । लोग कहते हैं की लडके लडकी के बीच प्रेम संबंध बढ गये हैं । लेकिन ज्यादातर टाईमपास ही है । शादी की बात आती है तो माबाप के पास चले जाते हैं । खास कर लडकियां बहुत सयानी हो गई है । दोस्ती के समय लडके की सारी पोल जान लेती है । फीर उसे ठुकरा देती है । हर लडके में पोल ही पोल होती है तो प्रेम विवाह ज्यादा नही हो रहा है । शादी के बाद भी पोल खुलती है । लेकिन चलानी पडती है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

भदौरिया जी, मुझे नहीं लगता कि शादी वाला मसला इतना गंभीर है... आज कल अपने केरियर और पढाई के चक्कर में लडके लडकियां शादी में कतई जल्दी नहीं करते.. कठिन होती परिस्थितियों में वह समझ चुके हैं कि बिना स्थापित हुये जिन्दगी चलाना कठिन है.. इससे कई बार समय निकल जाने पर जरूर शादी में दिक्कतें आती हैं. आज कल अरेंज मैरिज और लब मैरिज में फ़र्क नहीं रह गया है... लोग जागरूक हो गये हैं और यदि लडका लडकी राजी है और मैच मिल रहा है तो बुराई क्या है... अविभावकों को भी बच्चों की इच्छाओं का सम्मान करना चाहिये... अपना समय भूलना नहीं चाहिये... हर व्यक्ति इस दौर से गुजरता है परन्तु समय आने पर भूल जाता है. जहां तक भाग जाने का प्रशन है वह तो वही करते हैं जो अपरिपक्व होते हैं... समझदार कभी ऐसा कार्य नहीं करेगा जिस से उसके माता पिता को निराशा या शर्म का सामना करना पडे. लिखते रहिये

के द्वारा: Mohinder Kumar Mohinder Kumar

के द्वारा: सुधीर कुमार सिन्हा सुधीर कुमार सिन्हा

अशोकभाई नमस्ते आप पराई शब्द युज करते हो ये भावनात्मक शब्द है । समाज भावना पर नही सहुलियत पर चलता है । कई जगह ऐसा भी चलन था की बाप अपनी बेटी के घरका पानी नही पिता था । यही भावना थी की बाप बेटी के बीच का मोहभंग करना जरूरी था । बाप बेटी को याद कर कर के दुःखी ना होता रहे और बेटी भी अपना मायका भुल कर अपने ससुराल में बराबर सॅट हो जाये । कडवा घुट है लेकिन पीना पडता है । फ्री सेक्स की बातें तो मैं नही वो लोग करना चाहते हैं जो बलात्कारियो को बचाना चाहते हैं । कुछ साल पहले बंगाल मे एक स्कुली बच्ची का रेप कर के उस के टुकटे टुकडे कर दिए । फंसी की सजा दी गई । लेकिन पिछेले दिनो आपने देखा होगा सरकारने १८-२० फांसी के उम्मिदवारों की फांसी की सजा माफ कर दी । उनमें एक उम्मिदवार ये रेपवाला महाशय भी है । क्या गुजरी होगी उस लडकी के माबाप पर ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

जवाहरभाई नमस्कार बहुत ही अच्छी कविता । ----सुन्दर बालिका नगरवधू कहलाती थी, तब भी द्रौपदी की साड़ी खींची जाती थी!….---- लेकिन वो जमाना तो देखो । ५-७ हजार पूराना । अबोध जाहिल लोग । उनमे से कुछ बुध्धिमान नोनमेट्रिकों की लिखी परी कथाएं । आज कीसी काम की नही । आज का समाज उन बातों पर नही चलता है । आस पास की समस्याएं और उसे सुलजाने के तरिकों के अनूरूप लोग वर्तन करते हैं नियम अपने आप बनते जाते हैं । धर्म और धार्मिक किताबें सिर्फ सुनने के लिए हैं । कोइ मानता नही, बात अपनी पसंद की हो तो मानते भी है । खराब चीजें देखने में भी आदमी को मजा आता है मिडिया क्या करे । बालिका या किशोरी की रक्षा क्यों नही हो रही मैंने बताया है । आदमी को सबकुछ एक साथ नही मिलता । पाने के लिए खोना पडता है । समाज में शान्ति भी चाहिए और गुंडों के लिये दाया भी करनी है । ये दो चीजें एक साथ नही हो सकती ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

आदरणीय भरोदिया जी, नमस्कार! आपने बातें तो समझाकर कही है ... आधुनिक सोच से लगता है आपकी ठनी है! कन्याहरण(या सीता हरण) तब भी होता था! सुन्दर बालिका नगरवधू कहलाती थी, तब भी द्रौपदी की साड़ी खींची जाती थी!.... योद्धागन चुपचाप देखते थे. भीष्म जैसे प्रतापी भी आंखे फेर लेते थे. आज असम, कल दिल्ली! आम जन क्यों है भींगी बिल्ली. यह सोचकर, यह मेरी बिटिया या बहन तो नहीं है! मीडिया वाले या मोबाइल कैमरावाले वीडियो बनाते हैं, एक ही खबर को दिन भर चलाते हैं एक बार बलात्कार हुआ था जिसका बार बार उसी को दिखाते हैं ... इस देश में मर्यादा अब बची कहाँ है, विधान सभा मे विधायक और टी वी के नायक सबको सिर्फ अपनी पड़ी है, सन्नी लियोन अब सामने खड़ी है! कटी पतंग बहुत ही अच्छी पिक्चर थी आज तो क्रिकेट मैच में भी 'माडल' फिक्सर थी कहाँ तक गिनाएं, अंक कम पड़ जायेंगे क्या हम सब मिलकर अभी भी कोई हल निकालेंगे! खाप पंचायतें जब कोई फैसला लेती हैं सभी एक साथ बिफर पड़ते हैं क्यों नहीं वे किसी नारी, बालिका या किशोरी की रक्षा करते हैं. गो रक्षा पशु रक्षा को हो रहे आन्दोलन पर स्त्री, बालिका का हो रहा है दोहन!......बस! दुसरे विद्वान अपने विचार अवश्य रखें !

के द्वारा: jlsingh jlsingh

अशोक भाई नमस्कार बहुत परेशान करती है अपने मां बाप को । कितने लायक लडके हो सकते हैं उन के सर्कल में ? ३० ? ४० ? ६० ? कभी लडका मना करता है कभी लडकी । एक बाप की नजर से सोचोगे तो आप को ये पूर्वाग्रह नही लगेगा । कोइ कोइ तो ३०-३२ की हो जाती है । फिर गीरती है खाई में । अपनी हैसियत के बाहर डिमांड करना मुर्खता ही है । मुझे मराठी प्रजा खुद्दर प्रजा लगती है, मैंने कभी नही सुना की कोइ मराठी परीवार ने अपने लडकी की शादी में पैसे लिए हो । आपने सुना है तो जरूर कीसीने मजबूरी में लिये हो । गुजराती लडकों मे वो तीन चीज देखते हैं । दहेज का झंझट नही(गरीबों की बडी समस्या यही है) , धन्धे रोजगार में दूसरों को मात दे देते है, और शराब से दूर रहते हैं (खास कर लडकी की मां दारु से तंग होती है )। बदमाश लडके पी लेते हैं वो अपवाद है । अच्छे बूरे परिणाम तो सब तरह की शादी का होता है । ईस का कोइ अलग, एक्ष्ट्रा बूरा परिणाम नही होता ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

भारोडिया जी भाई नमस्कार, आप गुजरात की लड़कियों को लेकर पूर्वाग्रहग्रस्त मालुम पड़ते हैं. सभी लडकियां अपने लिए उपयुक्त वर की ही तलाश करती हैं और लडके भी अपने लिए सुन्दरतम लड़की खोजने में कहीं पीछे नहीं दिखते. जाति में शादी के अब कोई बहुत मायने नहीं रह गए हैं जब से विदेशों में नौकरी करने वालों की तादाद में इजाफा हुआ है तबसे अंतरजातीय विवाहों की बाढ़ सी आ गयी है. लड़कियों की कमी से प्रायः सभी राज्य गुजर रहे हैं. महाराष्ट्र के गरीब तबके से बड़ी संख्या में रुपये लेकर लड़कियों को दूर प्रदेश में ब्याहने का कार्य पिछले कुछ वर्षों से जोर पकड़ रहा है. हमेशा परिणाम अच्छे ही आयेंगे ऐसा सोचना भी बेईमानी हैं.

के द्वारा: akraktale akraktale

दिनेश भाई, जवाहर भाई, डॉ साहब और अल्का बहन आप सब को प्रणाम मुझे गुजरात की समस्या मालुम थी और पंजाब के बारेमें सुना था, स्योर नही था । मेरा लेख सिर्फ गुजरात की समस्या को लेकर था । अब जब आप लोगों के माध्यम से मालुम पडा है ये समस्या सर्वव्यापी है और बढने वाली है तो मेरा ये लेख खारिज हो जाता है । क्यों की सब राज्यों को लडकियों की कमी सताती होगी और और सतायेगी । अब ईस समस्या की जड पर सोचना चाहिए । ईस की जड है लडकों की चाहत । और ये सनातन है । आसानीसे बदलनेवाली नही है । और आदमी की ये चाहत गलत भी नही है । भारत में बुढे मां बाप की जिम्मेदारी लडकों पर होती है । कौन सा आदमी लडका नही चाहेगा । ईस जड का समाधान सरकार ही कर सकती है, वयस्कों की जिम्मेदारी ले कर । भले सरकार उस वयस्क की संपत्ती, अगर हो, अपने नाम करले । लेकिन एक अच्छा बेटा तो सरकार को ही बनना पडेगा । अगर ऐसा होता है तो बहुत ही फर्क पड जायेगा । लोगों का रवैया बदल सकता है । बाकी तो डॉक्टरों को दंडित करने से या बेटा बेटी समान है, ऐसे नारों से कुछ होनेवाला नही है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

दिनेश भाई नमस्कार किसी ने बलात्कार का गुनाह किया है । कारण ढुंढने की जरूरत नही । कारण हवस है । क्या समाज उस की हवस पूरी कर सकता है ? किसीने खून किया । कारण जानने के बाद भी सोलुशन क्या हो सकता है । अभी बेंक का ए.टी.ऍम ले के भागने का फेशन है । कारण लालच । समाज उन की लालच पूरी नही कर सकता । ए.राजा को क्या कमी थी ? फिर भी उसने कितने लाख करोड उठाए आप जानते हो । सब गुनाह समाज के कारण, मजबूरी के कारण होते हैं वो बात आप भुल ही जाओ । परिस्थितियां सिर्फ रोटी चोरने(छोटी चोरी) तक का ही गुनाह करवाती है, ऍ.टी.ऍम उडाने तक का नही । और कोइ गुनाह ईस दायरे में नही आता । कुछ आदमी का माईन्ड ही आम जनता की तरह सामान्य नही होता है,विद्रोही होता है । अगर सही दिशामें चला तो बहुत अच्छे और बडे काम कर जाता है । गलत दिशामें चला तो गुनाह करवा देता है । हम और आप जैसे आम आदमी चाह कर भी गुनाह नही कर पाते, कल बुढे होकर मर भी जायेंगे लेकिन ना कोइ अच्छा और बडा काम कर पयेंगे ना गुनाह कर पायेंगे । चम्मच चोर को फांसी और आतंकवादी को मिली फांसी, दोनो में फरक होता है ना ।

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अशोक भाई नमस्कार एक पूरानी ब्लॅक ऍन्ड वाईट फिल्म देखी थी । जीस में स्व.हिरालाल जेल के जेलर बने थे । वो जेल के अंदर दौरा करने के लिए निकलते हैं । एक पौधा और उस पर लगा फूल देखते हैं । गुस्से से फूल और पौधे को छडी मारते हैं । गुस्सा देख पौधा लगानेवाला नौकर भागा भागा आता है । "फुल लगाने हो तो जेल के बाहर रास्ते पर लगाओ, जेलमें फूलों के लिए कोइ स्थान नही । " ईतना बोल कर बडे रुआब के साथ चले गये नौकर कांपता हुआ खडा रह गया । ये ६० साल पहले के फिल्मकार या लेखक का नजरिया हो सकता है । नजरिया बिलकुल साफ था । जेल समाज की दवा है और वो कडवी ही होती है । ईस दवा से समाज तंदुरस्थ रह सकता है । आज हमारा नजरिया बिलकुल साफ नही है । हम बहुत चीज एक साथ चाहते हैं । हम चाहते है समाज में शान्ति बनी रहे, कोइ खूनखराबा या अन्य गुनाह ना हो । साथ साथ गुनाह रोकनेवाले उपाय भी हम ही कमजोर किये जा रहे हैं । हम तय नही कर पा रहे हमारी सहानुभूति समाज के साथ होने चाहिये या गुनहगारों के साथ । विचाराधीन कैदियों का ममला अलग है । वो सरकार और खूद न्यायतंत्र की नाकामी है, जेल का कोइ रोल नही । विचाराधीन कैदी होने ही नही चाहिए । विचार ? कितना ? बीना विचार किए ही ठुंस दिया जेलमें ? आदमी की आजादी की कोइ किमत नही ? निर्दोष साबित हुआ तो ? विचार के लिए लिमिट होनी चाहिए । सरकार और न्यायतंत्र की नाकामी नागरिक क्यों भुगते ?

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के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

भाई भदौरिया जी, मेरी व्यक्तिगत  राय  है कि कैदियों को सजा नहीं बल्कि उन  कारणों को ढ़ूढ़कर  जिसके कारण  उन्होंने अपराध  किया है दूर करना चाहिये। कैदी भी समाज  का एक  अंग  होता है। अन्य  व्यक्तियों की तरह उसके प्रत्येक  कृत्य  के लिये समाज  जिम्मेदार होता है। परिस्थितियाँ किसी व्यक्ति को अपराधी बनाती हैं। ईग्लैण्ड में महान  सुधारवादी विचारक  एवं दार्शनिक  बेंथम  के समकालीन या उनसे पूर्व  एक  बालक  को चम्मच  चुराने के आरोप  में फाँसी की सजा दी गई  थी। इस  घटना से बेंथम  के जीवन पर बहुत  बुरा प्रभाव पड़ा। और उन्होंने बीड़ा उठाया कि जेलों को सजा के लिये नहीं अपितु  कैदियों के सुधार के लिये बनाना है। और इस  कार्य  के लिये उन्होंने अपना तन, मन एवं धन  समर्पित  कर  दिया। और  इग्लैण्ड में क्राँतिकारी परिवर्तन  हुये। बड़ी दिलचस्प जीवनी है इसकी यह कैब्रिज  विश्वविद्यालय में किसी विभाग  के हैड अॉफ  दा ड़ुपार्चमेंट  भी थे। आज  भी कैब्रिज  विश्वविद्यालय  में इनकी सिर रखा हुआ   है। संभवतः रिसर्च  के लिये रखा गया था।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

प्रिय भरोदिया जी ..... सप्रेम नमस्कारम ! अगर जेल में पत्नी के इलावा प्रेमिका की सुविधा मिल जाए तो मैं बिना किसी जुर्म के भी जेल जाने को तैयार हूँ ..... कुछ इस बारे में भी करो और सोचो मेरे भाई वैसे जब पुलिस प[प्रेमिका को उठाने जायेगी तो उसको हर हाल में आना ही पड़ेगा कोई भी उसको रोक नहीं पायेगा .... वैसे एक बात की और भी आशंका है जेल में + थाणे में जो भी इस्त्री एक रात रह लेती है वोह फिर अपने पति के काबिल नहीं रहती .... अब यह तो समय ही बतलायेगा की इस स्कीम में आखिरकार फायदा होगा किसका ?.... मुबारकबाद :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-? :-x :-) :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-P :-? :-x :-) :evil: ;-) :-D :-o :-( :-D :evil: ;-) :-D :mrgreen: :-? :-x :-) : :roll: :oops: :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) जय श्री कृष्ण जी

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

अनिल भाई नमस्कार और आप का स्वागत है । आप ने जो बातें लिखी वो एकदम सही है । पर जेल के नियम कानून बहुत पूराने है और ईसे बनानेवालों ने कल्पना भी नही की होगी आगे चलकर नियम,कानून,जेल, सब की दुकने लगेगी और बीकने लगेंगे । धनी और दबंग तो ईसे खरीदेंगे ही । वो क्यों डरने लगे जेल से । करप्शन एक बडा प्रोब्लेम हो गया है हमारे साथ । हमारी कोइ भी सिस्टम ईतनी खराब नही है जीतना हम सोचते हैं, करप्शन की शिकार हो गई है । करप्शने के कारण नई सिस्टम बनाते है वो खराब बनती है । और करप्शन की मां हमारी श्रध्धा ही है । आपने भी लिखा है ---खुद को शरीफ कहने वाले हम सभी सामाजिक प्राणी बहुत ही श्रद्धा से उनके सामने शीश झुकाते आते हैं---- आभार आप का ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

मेरी जहाँ तक समझ है जेल किसी के फायदे और नुकशान के लिए नहीं होता......................! अह तो सुधर गृह होता है न कि घर के कोने में पड़ा डिब्बा..............! पर असिलियत तो यह है कि कोई व्यक्ति जेल जाने के बाद सुधरता नहीं बल्कि और बुरा बन जाता है....अपनी नज़र में और समाज के नज़र में............! कारण स्पष्ट है कि हमें घृणा पाप से नहीं बल्कि पापी से हैं........आज सभी जेल ऐसे पापियों से भरे हुए हैं जिनमे से अधिकांश को तो यह भी पता नहीं होगा कि कब और कैसे उनसे पाप हो गया . सच पूछिये तो सजा कमजोर और बेगुनाहों को ही होती है.............और गुनाहगार पैसे और ताकत के दम पे खुले आसमान में उड़ाते रहते है और खुद को शरीफ कहने वाले हम सभी सामाजिक प्राणी बहुत ही श्रद्धा से उनके सामने शीश झुकाते आते हैं ...........! मेरे कहने का मतलब यह है कि हकीकत क्या है आप भी जानते हैं.....किसी को सजा देने का मतलब यह नहीं है कि उसके साथ जानवर जैसा बर्ताव किया जाय......किसी को कैद करने का मतलब यह नहीं कि मानवीय अधिकारों को रौद दिया जाय.....! और जो आप कह रहे हैं जेल को दिखाकर लोगों में दर पैदा करने के लिए ...तो उससे डरता कौन है ? वही गरीब और शरीफ लोग ......और उसके अन्दर यातनाएं भी यही मासूम लोग पाते हैं.........जो सही में गुनाहगार हैं उनके लिए तो जेल एक कल है और कोई फर्क नहीं पड़ता उन्हें कि वह अन्दर रहे या बाहर unki बीबी साथ है या नहीं ......... ऐसे दबंग लोगों के सेवा के लिए जेल के अन्दर और बाहर बहुत औरते मिल जाती हैं.....खुद कुछ महिला सुरक्षा कर्मी भी लिप्त हैं इसमे.........! पर एक बेगुनाह, कमजोर और गरीब जो जेल के अन्दर तपड़ता है और उसकी बीबी जेल के बाहर ...आखिर यह कैसा न्याय है, कैसा इन्साफ है और कैसी सजा है................. मैं सुन रखा हूँ कि काननों में लिखा है, भले ही १००० गुनाहगार छुट जाएँ परन्तु किसी एक बेकसूर व्यक्ति को सजा नहीं होनी चाहिए.....पर हकीकत क्या है आपको भी पता है और मुझे भी.....................!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

वासुदेव भाई नमस्कार मैं रहता हुं उस इलाके में भी एक बस्ती है । रिक्षावाला को कहो की बंगला देश जाना है वो ले जाता है । एक संख्या से नाम ही बंगलादेश पड जाये, सिर्फ एक उपनगर में तो पूरे शहर, राज्य या देशमे कितनी संख्या होगी । और भारत तो दुकान ही है ना । ईस दुकान में २०० से २००० में राशन कार्ड मिल जाता है । बाद में तो जीतनी भी आई.डी बनाना हो बना लो । आई.डी का सबसे बडा दुरुपयोग घुस पैठ में हुआ है । ये कागज का बाघ बना रहता है जबतक असली और जमिनी कानून का सही तरह उपयोग ना हो । सरकार मान कर चलती है की ये लोग शुध्ध रूप से हमारे ही मतदाता है । मूल भारतवासी हमारे वफादर नही है, विरोध पार्टी को वोट दे सकते है । सरकार तो हमसे ज्यादा उन का ही जतन करेगी ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

राजकमलभाई नमस्ते आई.डी का जहां फायदा है वो हम जानते हैं लेकिन जहां नूकसान है वो मैं बताता हुं । बेंकिंग में फायदा भी है नूकसान भी । फायदा ये है की कोइ घपला कर के भाग नही सकता । नूकसान ये है की जाली आई.डी का उपयोग कर के घपलेबाज खाता खोलते हैं और घपला कर देते हैं । ईन्टरनेट बेंकिन्ग आज खतरे में पड गया है आई.डी के कारण । ग्राहकों की आई.डी आम हो गई है, ईन्टरनेट के चोर-बाजारमे सारे डेटा बिक रहे हैं । बेंक वाले मानने के लिये तयार नही है । चोर अपने पास रहे डेटा का उपयोग करते हुए खाता का नया पासवर्ड मांगता है, ओन्लाईन ही । तीन ही चीज सच पड जाये तो पासवर्ड मिल जाता है । खाता नम्बर, पॅन नम्बर और जनम तारिख । हो गया कल्याण ? लोग रोजी रोटी के लिए बडे शहरों में जाते हैं । दुसरे शहर का पता नही मुंबई की बात करुन्गा । यहां रोजी रोटी के लिये आये हुए लोक शरुआत में अकेली जान होते हैं । किसी के सहारे किसी के साथ रहता है । काम मिलने पर भाडे का घर देखता है । यहां अनलिखा रुल है की किरायेदार का फोटो और आई.डी पूलिस में जमा कराओ । लेकिन यहां तकलिफ हो जाती है । भाडे के मकान के रुल भी थोडे विचित्र है, ११ महिने से ज्यादा कोइ भाडे पे नही देता । और कोई मकान मालिक ये नही चाहेगा ही की उन का भाडुत रेशन कार्ड आदी कोइ प्रूफ बनाले उस मकान को ले के । कोइ लालची भाडुत मिल जाता है तो मकान खाली करने में तकलिफ होती है । ११ महिने से ज्यादा समय आई.डी प्रूफ के साथ किसी को रहने देना खतरनाक था एक समय । आज मकान हडपने के किस्से नही होते हैं । लेकिन फिर भी लोग सवधान है । पूलिस भी आदमी ही है वो सब समजते है ईस लिये अपनी बात पर वो जोर नही देते । चलता है बीना आई.डी. फोटो और नाम से काम चल जाता है, लोग वो बी नही देते । दिनेश भाई नमस्कार राजकमल भाई ने विमान सेवा की बात कही । सबसे ज्यादा खतरा हाईजेक होने का है । आई.डी से भी ज्यादा हथियार का ध्यान रखना पडता है । बुरा काम करने वाले ऐसी आई.डी. तैयार करके लाते हैं की असली है या नकली पहचानना मुश्किल हो जाता है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

भरोडिया जी भाई, सादर, इन्टरनेट पर रेलवे की आरक्षित टिकिट प्राप्त करने के लिए आय डी की आवशयकता होती है इससे आप घर बैठे टिकिट प्राप्त करते हैं और आरक्षण कार्यालय जाकर लम्बी लम्बी कतारों में लगने से बच पाते हैं. आय डी के रूप में पेन कार्ड के उपयोग के कारण ही आज आयकर विभाग घर बैठे टैक्स रिटर्न्स फ़ाइल करवा रहा है. जिसके कारण अवकाश लेकर आयकर कार्यालय की कतारों से मुक्ति मिलती है. मैंने ये दो उदाहरण इसलिए दिए हैं की आप लिख तो आय डी रहे हैं किन्तु बात सिर्फ फोटो आय डी की कर रहे हैं. आय डी मांगे जाने को आप जहां गुलामी जैसा महसूस कर रहे हैं वह कतई भी उचित नहीं है क्योंकि हर विशेष कार्यक्रम में फोटो आय डी गले में लटकाए हुए आपने वहां के सभी आगंतुकों को देखा होगा यह एक अच्छी सुविधा है इसे अन्यथा नहीं लिया जा सकता. धन्यवाद.

के द्वारा: akraktale akraktale

प्रिय भ्रोदिया जी ..... सप्रेम नमस्कारम ! मैं ऐसी चैकिंग के हक में हूँ ..... अमेरिकी इस मामले में दूसरे देश के भूतपूर्व राष्ट्रपति (कलाम )और सत्तासीन ग्रहमंत्री(फर्नाडीज ) और शाहरूख तक का लिहाज नहीं करते है .... बेशक रेल और हवाईयन चैकिंग के अलग मापदण्ड है लेकिन बात अपने असूलो पर चलते हुए नियम और कायदे कानूनों का सख्ती से पालन करने की है .... जब सवाल हजारों जिन्दगानियो की सुरक्षा से जुड़ा हुआ हो तो हमे यथा संभव सहयोग देते हुए थोड़ा बहुत कष्ट सहने के लिए भी खुद को तैयार रखना चाहिए :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-? :-x :-) :-? :-x :-) :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-P :-? :-x :-) :evil: ;-) :-D :-o :-( :-D :evil: ;-) :-D :mrgreen: :-? :-x :-) : :roll: :oops: :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P :mrgreen: :oops: :roll: :cry: :evil: ;-) :-D :-o :-( :-? :-x :-) :-P जय श्री कृष्ण जी

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

नमस्कार सन्तोषभाई आप जीस बहादूरी की बात करते हो उसे --निर्बल आदमी औरत पे शूरा ---कहा जाता है । कमजोर आदमी अपनी पत्नि को ही शूरवीरता दिखाता है । कमजोर को जोर दिखाना बहादूरी नही है । तगडा पडोसी हो या सडक का आदमी तगडा हो तो बात अलग हो जाती है । लेकिन मैने व्यक्तियों की बात नही कही है । प्रजा के पूरे समुह के लिए कहा है । ये समुह अंदर ही अंदर लडने और बहादूरी दिखाने में पहले से ही माहीर है । एक राजा दुसरे राजा से लडता था, धर्म को लेकर दंगा फसाद में भी बहादूरी दिखाते हैं । भाई को भाई मारे या प्रजा ही प्रजा को मारे उसमे कोइ बहादूरी नही है । दुश्मन को मारे तो बात बनती है । दुश्मन कौन और ये समुह आज कितनी यातना भुगत रहा है वो आप खूद जानते हैं ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

अशोकभाई नमस्कार कुदरत में एक ही सोचवाले दो आदमी कभी नही होते । क्यों की हम मित्र है ईस लिए आप को थोडा ज्यादा फिल हुआ । मैंने प्रजा का ही जिक्र किया है, आप ने ठिक याद दिला दिया । वो सैनिक ही थे । आम प्रजा तो लडना सिखी ही नही । लेकिन हारे हुए सैनिकों को मान अपमान से कुछ लेना देना नही होता । १९६५ के बाद के हमारे मौजुदा सैनिक के लिए मान अपमान का सवाल उठता है । क्यों की वो जीतते आए हैं । जब देश के अंदरूनी हालात की बात आती है तो सैनिकों की कोइ बात नही उठती । मैने कहीं स्वतन्त्रता सेनानियों की बात नही कही है पर बात निकली है तो ईस में भी जनता की बहादुरी नही दिखती है । और गांधीजी ने भी प्रजा के मार खाने के गुण का ही उपयोग किया था । झान्सी की रानी, बहादुरशाह जफर, तात्या तोपे बहादुर थे । लेकिन वो अंग्रेजों से लडे अपने अपने राज्य पाने के लिए । भारत के लिए नही । अंग्रज को हरा देते तो अपना अपना राज्य संभाल लेते, भारत नही बनाते । उन के लिए तो उन का राज्य ही उन का देश था । और उन को हराने वाले कौन थे ? मुठ्ठीभर अंग्रेज तो हरा नही सकते । भारत की ही जनता का एक गद्दार हिस्सा था जो अंगेजों का गुलाम बन के उन का साथ देते रहा था । और अंग्रेज भारत से गए वो भारत के स्वतंत्रवीरों के डर से नही गये थे । सब चीजें एक साथ हो गई थी । स्वतंत्रवीरों का हल्ला, उनका वैश्विक प्रचार, दुनियाभर में ज्ञान का विस्फोट, गुलामी प्रथा के विरोध में बढता हुआ वैश्विक जनमत । विश्व के नेताओं की सभाओं में अंग्रेज की मुंडी नीची जाती थी । काउबॉय के जमाने के या झांसी की रानी के जमाने के जंगली अंग्रेज नही बचे थे । नई मोडर्न पीढी आ गई थी । खूद लंडन में आदर्शवादी अंग्रेज भारत की प्रजा के पक्ष में बोलने लगे थे । आदमी अकेला कुछ नही कर सकता । लेकिन अपने लेवल से जो बन पडे करना चाहिए । जो मै कर रहा हुं । मैं सिर्फ प्रजा को जगा सकता हु । आये दिन प्रजा बात बात में रोती रहती है । मैं एहसास दिलाना चाहता हुं की रोने का कोई कारण नही है, अपने रोने के कारण समजो और उसमें से रोना ना पडे ऐसे उपाय ढुंढो । प्रजा को ही झाडना पड रहा है, क्या गलत कर रहा हुं । सबकुछ ठीक ठाक है, सब चीज ईज्जत देने लायक है तो फिर रोना ही बंद करोना । आप भले मानो पर देश अखंड नही है । पूरे देश में समान कानून होने चाहिए पर है नही । सब राज्यों में अलग है । केन्द्र जब कोशीश करता है समान कानून की तो सारे मुख्यमंत्री एक सूर मे विरोध करते है । केंद्र की दखल मानी जाती है । भाई, बाप दखल नही करेगा तो कौन करेगा ? मुख्यमंत्री एक सुबे से ज्यादा कुछ नही है पर उसे एक स्वतंत्र राज्य का राजा बन के रहना है । प्रजा को भी अपने राज्य की ही फिकर है, तभी वो अपने राज्य की छोटी पार्टी को वोट करती है । और वो पार्टी केंद्र का नाक दबाती रहती है और सारा माल अपने ही राज्य या अपनी ही जेब की और खिंच के ले जाती है । केंद्रिय पार्टी को वोट करने वाले राज्य देखते रह जाते हैं, जैसे गुनाह हो गया बडी पार्टी को वोट दे कर । क्या ये अखंड भारत के लक्षण है ? एक राज्य का आदमी दुसरे राज्य में जाता हैं वहां सताया जाता है । क्या ये अखंड भारत के लक्षण है ? देश सिर्फ सरहद से नही बनता । मेरा भारत महान जैसे नारे से भी नही बनता । नागरिक के बर्ताव से बनता है । आप की आखरी बात पर शुभेच्छा ही दे सकता हुं ।

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भरोडिया जी भाई नमस्कार, मुझे बहुत दुःख और अफ़सोस हुआ आपके विचार जानकार क्योंकि आपने एक साथ इस देश के वीर सैनिकों का अपमान किया है आपने हमारे सारे वीर स्वतन्त्रता सेनानियों का अपमान किया है. मुझे शर्म आती है आपकी ऐसी सोच पर, आज आप स्वतंत्र भारत में एक लोकशाही के शासन में जी रहे हैं जो मन में आया बोल सकते हैं किन्तु कभी अपने अन्दर भी झाँक कर देखो की आपने इस देश को क्या दिया है. देश के खंड खंड होने की जहां तक बात है तो कौनसा देश है जो खंड खंड नहीं है. और काश्मीर के गंभीर मसले को छोड़ दें तो कौनसा प्रदेश है जो अखंड भारत की सत्ता पर विश्वास नहीं करता? हाँ ये सही है की आज देश भ्रष्टाचार के बड़े संकट से निकलने का मार्ग खोज रहा है और कुछ देरी से सही मगर कामयाबी अवश्य मिलेगी.

के द्वारा: akraktale akraktale

वासुदेव भाई नमस्ते सही बात है । दारु को सस्ता करो । दारु के कच्चे माल की आपूर्ति अनाज सडा के करो । मेरा लेख मानव ईतिहास पर फोकस नही करता है । बस, चलन को थोडा बेकग्राउंड में ले जाना जरूरी था । विदेसियों का भारत में आने का ईतिहास जो हमें पढाया गया वो ईस तरह का है । उन के आगमन के समय प्रसिध्ध नाम का राज शाह जहां ही था । भारत को सोने की चिडिया नाम भारत के लोगों ने नही दिया है । युरोप की प्रजाने दिया है । बीना कोइ ठोस कारण । व्यापारियों की यारी दोस्ती में बात निकल गई । उस समय पूरे युरोप को गरम मसाला भारत के व्यापारी ही पूरा किया करते था । मसाले में एक काला दाना “मरी” होता था, उस की वहां बहुत डिमांड रहती थी । उस मरी को वो काला सोना कहते थे । विदेसी व्यापारी जो हमारे देश के व्यापारियों के दोस्त बन गये थे, उन्हों ने ईस व्यापार का व्याप और आमदनी देखते हुए सोनेकी चिडिया कहा । भारत कब सोनेकी चिडिया कहलाने लायक था कब नही वो कहनेवाले सोचता नही , ऐसी बातें सहज हो जाती है । व्यापारियों मे बहस हुई होगी “अरे यार क्या चिक चीक करता है । तुम लोग तो सोने के ढेर पे बैठे हो, सोने जैसे देश के हो, आप का देश मानो सोने की चिडिया है ।“ मानना ना मानना अलग बात है । ईतिहास को खंगालने कुछ नही मिलता । वहां कुछ ठोस मिलता नही है । बाकी आपने जो अपने को लूटानेकी बात कही तो मेरा मानना है की भारत की प्रजा में ही कायरता कुट कुट के भरी पडी है । भारत को लूटने हूण आए, मुस्लिम आये अंग्रेज आये और अब अन्ना जी के काले अंग्रेज लूट रहे हैं । भारत का नागरिक लूटवाने का नसीन ले के जनमता है । एक बहादूर बुढा और एक साधु लड रहे हैं । बाकी तो सब ठीक है ।

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चन्दन भाई नमस्कार मैने जो कहा वो शर्म के साथ कहा । मैने पहले से ही लिखा है । और ऐसा ही १० मे से ५ आदमी कहेगा । आप ने पी ऍफ की बात कही । पी ऍफ की योजना तो समाजवाद के चक्कर में कर्मचारियों के हित में बनी थी । कर्मचारियों के हित की रकम पर कोइ संस्था निर्भर हो जाए तो कर्मचारियों का दोष नही संस्था का दोष है और उस मे से कोइ रोजगारी मांगे तो वो बराबर नही है । कर्मचारियों ने दान नही दिया है, पसिने की कमाई है । ईस योजना में ब्याज भी अच्छा मिलता था, अच्छी योजना थी । अब ब्याज कम कर दिया । चलन की गीरती वेल्यु से फंड की वेल्यु भी कम हो रही है । ईन्श्युरन्स की बात तो अलग चीज है । ऐसी संस्थाओं की स्थापना ही लोगों की फोकट में पाने की चाह को भूनाने के लिए बनी है । २० आदमी का नूकसान १ का फायदा बनता है । उन की आलिशान ऑफिसें सरकारी खर्चे से तो नही चलते ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

नमस्कार सतिशभाई आप की बोतलवाली बात सही है । बोतलवाले बेफिकर रह सकते हैं । बोतलवालों को वैसे भी कोइ चिनंता नही होती है । जर्मनीवाली बात एक आफ्रिकन देश में भी हो रही है, मैं नाम भुल गया । शायद अब स्थिती सुधरी हो । दुकानदार के पास नोटों का ढेर हो जाता था । उसे नोट चोरी होने की चिन्ता नही थी, सामान कोइ चुरा ना ले वो फिकर रहती थी । सोने को साईड में करने का कारण डॉलर की स्विक्रुति है । विदेशी कमाई, पहेले के जमाने में सोने में या अन्य किमति चीजों के स्वरूप में आती थी, अब डोलर में आती है । जीतने डोलर आते हैं, जाते हैं उस में जो बचता है, उतना देशी करंसी छाप सकते हैं । ईस नियम में खराबी नही है । लेकिन नियम से कौन चलता है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

आदरणीय भरोदिया जी, बहुत ही सटीक लिखा है आपने.., आज वचन सिर्फ दो बीड़ी पिलाने का ही रह गया है..!! बीड़ी वाले को यदि सिगरेट का चस्का लग जाए तो घर ही बेंचना पड़े!! ऐसा ही हो रहा है, दारू से टैक्स कम करके लोगो के घर बिकवाये जा रहे हैं!! आपके लेख के दो बिन्दुओं में संशोधन की आवश्यकता देखता हूँ, एक तो शाहजहाँ के काल को स्वर्णकाल तो कहा जाता है लेकिन सोने की चिड़िया नहीं! यह दूसरी बात हो जाती है| सोने की चिड़िया का अर्थ आर्थिक सम्पन्नता की पराकाष्ठा से है जबकि शाहजहाँ के शासन काल में सम्पन्नता पहले से बढ़ गई हो ऐसा इतिहास में प्रमाण नहीं मिलता| ७१२ ई से लुटता भारत बहुत कुछ खो चूका था, खोये की भरपाई भी नहीं हुई थी!! आर्थिक रूप से भारत स्वावलंबी अवश्य था किन्तु सोने की चिड़िया नहीं क्योंकि सोना लुट-लुटकर दमिश्क अफगानिस्तान पहुंचकर रेत हो चूका था| सोने की चिड़िया भारत वास्तव में गुप्तकाल व मौर्यकाल में ही था| शाहजहाँ का शासन सुशासन व धार्मिक सुहृदयता के आधार पर स्वर्णकाल कहा जाता है किन्तु हम जानते हैं कि भारत का इतिहास कई कटुसत्य छिपाता है..भाईचारे के नाम पर!! शाहजहाँ की प्रसंशा में काढ़े जाने वाले कसीदे उसके ही दरबारी चाटुकार कामगार खां के लिखे किस्सों को ही इतिहास मानकर पढाया जाता है! चरण को इतिहासकार के रूप में स्वीकारोक्ति देना हास्यास्पद ही है| शाहजहाँ ने अपने ही पिता जहाँगीर के खिलाफ युद्ध छेंड था., अपने अंधे किये गए भाई खुसरू व देवरबख्स आदि भतीजों को क़त्ल करके वह गद्दी पर बैठा था| आपको पता ही होगा कि वह भी अपने ही बेटे औरंगजेब के हाथों जेल में डलवा दिया गया था जहाँ उसकी दयनीय अवस्था में मौत हुई थी| शाहजहाँ जिसे मुमताज का आशिक व प्यार की मूरत कहा जाता है हरम में हजारों औरते रखता था| मुमताज १५वि संतान को जन्म देते हुए मर गई थी| अपनी ही पुत्री जहांआरा से उसके शारीरिक सम्बन्ध थे, जिसके बारे में वह कहता था कि माली को अपने लगे पेड़ पर हक़ होता है| उसने ३० साल के शासन में ४८ युद्ध किए... स्वर्ण काल में एक भी साल शांति से नहीं गुजरा!! समृद्धि का भी आंकलन आप कर सकते हैं कि उसके शासन में कितने ही दुभिक्ष पड़े.. तत्कालीन वर्णन में अब्दुल हमीद ने लिखा है कि जीवन एक रोटी के लिए बिक रहा था.. बकरी के मांस के नाम पर कुत्ते का मांस बिक रहा था... मरे लोगों की हड्डियाँ पीसकर आते में मिलकर बेंची जाती थी.. आदमी आदमी को खाने लगा लगा था पुत्र का मांस उसके प्रेम से अधिक अधिक कीमती था..!!! दूसरा नेहरु के सम्बन्ध में क्योंकि मुद्रा के अवमूल्यन की शुरुआत नेहरु ने ही सत्ता में आने के तुरंत बाद से अमेरिका के दबाब में स्वीकार किया था..!! ...सादर!!

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

भदोरिया जी काफी दिनों बाद मुलाक़ात हुई ओर भी अचानक / आपकी पोस्ट देखी तो मुझे भी स्कूल के दिनों की याद आ गयी जब बेंकिंग जो हमारे पास दसवीं में एक सब्जेक्ट था ये सब पढाया जाता था / कि किस प्रकार रिजर्व बेंक ( केंद्रीय बेंक ) कागजी मुद्रा जारी करने के लिए उसके मूल्य के बराबर सोना अपने पास रखता था / बाद में ये महसूस किया गया कि सभी लोगों को सोने की आवशयकता नहीं रहती अतः एक निश्चित मात्रा में रिजर्व बेंक सोना रखकर कागजी मुद्रा जारी कर सकता हें जो आज भी हो रहा हें / ओर शायद ये ही एक मुद्रा स्फीति ( Inflation ) का कारण हें / आज सरकार जितने चाहे नोट जारी कर सकती हें व उसके बराबर सोना नहीं रखना होता तो इस कारण मार्किट में ज्यादा रूपये चलन में आने की कारण उसकी क्रय शकित घटती हें / आपका ये लेख इसी ओर इशारा करता हें / आपने अच्छा लिखा / आज रूपये की क्रय शक्ति काफी गिरी हें अतः रूपये में बचत के बजाय सोने , जमीन आदि में भविष की बचत रखना ठीक हें उसमें भी सोना उत्तम हें जिसमें तरलता ( liquidity ) हें जमीन में निवेश में तरलता नहीं हें व उसकी रखरखाव भी मुशिकिल हें जब की सोने चांदी व अन्य बहुमूल्य धातु को रखना आशान हें/ एक घटना याद हें जब कक्षा में टीचर कहते थे - दिव्तीय विशव युद्ध में जर्मनी में मुद्रा स्फीति बहुत बढ़ गयी / एक भाई बजत करता था एक शराब पीकर खाली बोतल छत पर फेंक देता था / बजत करने वाला भाई वहां की मुद्रा की क्रय शक्ति गिरने के कारण बर्बाद हो गया परन्तु शराब पीने वाले भाई को खाली बोतल बेचकर अपने भाई की बजत से कहीं ज्यादा रकम मिली / भारतीय रूपये के साथ भी ये ही हो रहा हें

के द्वारा: satish3840 satish3840

अशोकभाई आप की बात असम सरकारने सुन ली है । अब हमे कोइ फरियाद नही है । ये दैनिक भास्कर का पूरा लेख है । गुवाहाटी में बुधवार को पूर्वोत्तर भारत के 'सांस्कृतिक दूत' कहे जाने वाले मशहूर संगीतकार, गीतकार और गायक डॉ. भूपेन हजारिका का अंतिम संस्कार किया जाएगा। असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने यह घोषणा की है। असम और अरुणाचल प्रदेश सरकार ने हजारिका के सम्मान में राजकीय अवकाश भी घोषित किया है। डॉ. हजारिका को उनके पुत्र मुखाग्नि देंगे जो अमेरिका से गुवाहाटी पहुंच रहे हैं। तेज अपनी मां प्रियंवदा के साथ अमेरिका में ही रहते हैं। तबियत खराब होने की वजह से प्रियंवदा भारत नहीं आएंगी। डॉ. हजारिका का पार्थिव शरीर गुवाहाटी विश्वविद्यालय के प्रांगण में रखा गया है, जहां आज बड़ी तादाद में विश्वविद्यालय और आसपास के कॉलेज के छात्र बड़ी तादाद में डॉ. हजारिका के अंतिम दर्शन के लिए उमड़ रहे हैं। भीड़ के चलते छात्रों को कई घंटों तक इंतजार करना पड़ रहा है। दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित डॉ. हजारिका गुवाहाटी विश्वविद्यालय में अध्यापन भी कर चुके हैं। यही वजह है कि विश्वविद्यालय का झंडा उनके प्रति सम्मान में आधा झुका हुआ है। गुवाहाटी विश्वविद्यालय में आ रहे छात्रों का कहना है कि डॉ. हजारिका ने असम के युवाओं को एकता के सूत्र में पिरोया। इससे पहले सोमवार को असम की जनता ने अपने 'सांस्कृतिक नायक' के अंतिम दर्शन नम आंखों से किए। दोपहर में डॉ. हजारिका का पार्थिव शरीर मुंबई से गुवाहाटी एयरपोर्ट पहुंचा। एयरपोर्ट से हजारिका के निजरापार में मौजूद घर तक 25 किलोमीटर के रास्ते में लोगों का तांता लगा रहा है। डॉ. हजारिका के चाहने वाले उनके पार्थिव शरीर पर फूल और असम का मशहूर गमछा अर्पित कर रहे थे। गुवाहाटी में हजारिका की शवयात्रा के दौरान कई लोग अपने जज्बातों पर काबू नहीं रख पा रहे थे और डॉ. हजारिका के प्रति उनका लगाव और आदर आंसुओं के रूप में आंखों से बह रहा था। उनके कई प्रशंसकों ने डॉ. हजारिका के गीत गाकर उन्हें आखिरी विदाई दी। हजारिका का पार्थिव शरीर निजरापार में मौजूद उनके पैतृक घर पर भी काफी देर रखा गया। डॉ. हजारिका का बीते शनिवार को मुंबई के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया था।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

आदरणीय भरोडिया भाई नमस्कार, आपने मंच के माध्यम से आदरणीय भूपेन हजारिका जी को जो श्रधांजलि दिलवाई है वह बहुत ही सराहनीय कार्य किया है. मै भी इस मंच और आपके ब्लॉग के माध्यम से भूपेन जी को श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ. मगर दुःख होता है की एक दादा साहब फाल्के पुरस्कार विजेता महान गायक,गीतकार और संगीतकार को सरकारी तौर पर जो श्रद्धांजलि मिलना चाहिए थी वह नहीं मिली. हिंदी गीतों की गायकी में तो हजारिका जी को श्री गुलजार साहब लाये थे उन्ही ने उनके आसमिया गीतों को हिंदी रुपान्तार्ण किया था.जबकि उनके असमिया गीत जो लोहित नदी पर गाये है भाषा न समझ आये फिरभी उनको सुनकर मन हर्षित हो जाता है.आभार.

के द्वारा: akraktale akraktale

चातकभाई नमस्ते माया और हम लगभग एक ही समय एक ही सयकल पर बैठे थे । शून्य आंकडे का उपयोग ईस की साबीती है । माया ने भी शून्य का अच्छी तरह उपयोग किया है । उस समय कोई साधन नही थे एक दुसरे के मेले मिलाप के । हम एक दुसरे को सिखा दे ऐसे रास्ते थे ही नही । उन का बडा सायकल और हमारे बडे सायकल ने अंतर नही है । ईसे हम ने क्वोलिटी वाईज, सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और कलयुग में विभाजित किया है । ये चार युग पसार होते है तब हमारा बडा सायकल पूरा होता है । आज खराब क्वोलिटी वाला कलयुग का हिस्सा चल रहा है । हमारे पास तारिख नही है लेकिन ये हिस्सा पूरा होते सयकल सतयुग से रिपीट होगा । कलयुग की कुटिलता और सतयुग की सज्जनता के बीच बडी खाई है । विनाश और नवसर्जन के सिवा कोई चारा नही । हमारे और उन के सायकल का पूरा होने का समय लगभग एक साथ हो गया है । ये कोई अकस्मात नही है । कुछ तो राज है जो हम नही समज सकते ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

अशोकभाई मैने हिन्दी और अंग्रेजी की स्पर्धा बताई है । और कुछ लोग को हिन्दी के गीरते स्तर का दर्द है, उसे मिटाने की कोशीश की है । हिन्दी अपने बलबूते पर भारत के तीन कोने तक पहुंच ही गई है । निचे एक कोना ( दक्षिण ) बाकी है वो तो बाकी ही रहेगा । हिन्दी एक लिपी या शब्द तक सिमित नही एक जीवन शैली भी बन चुकी है । पाकिस्तान को हिन्दी फिल्म उद्योग अपना ही लगता है वो हिन्दी और जीवन शैली के कारण । दुनिया के दुसरे बहुत से देशों में हिन्दी फिल्में जाती है । वहा सब हिन्दी नही जानते । वहा अपनी भाषा डब करवाते है । दिन्दी तो डब हो जाती है हिन्द की जीवन शैली नही । आज हिन्दी भारत की महाभाषा है । बडी भाषा का शब्दकोष बडा बन जाता है । जब अन्ग्रेजी भी बीस तहर की बोली जाती है दुनिया में तो २५ तरह की हिन्दी क्यो नही । हिन्दी का चालक आज साहित्यकार नही, बोलने और सुनने वाले लोग है । साहित्यकारों के शब्द नागरिक नही साहित्यकार ही समज सकता है । और नागरिकों के पास समय भी नही है । नए साहित्यकार समज गये हैं और नागरिकों के पीछे चल पडे हैं । अपनी जीद में कोई हिन्दी को चलाना चाहेगा तो वो खूद पीछे छुट जाएगा हिन्दी आगे बढ जायेगी । ... व्याकरण नामकी चीज तो हर भाषा को परेशान करती है । येही चीज भाषा को दुसरों तक जाने से तोकती है ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya




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