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तेरे पैर की लात, विकास का इन्जन है ।

Posted On: 22 Feb, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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सलाम, सबको सलाम,
जीसके हाथमें दंडा उसे सलाम,
लात के भय से
दायां हाथ कुल्हे पर रख के
बायें हाथ से सलाम !
देखने वालों को सलाम,
नही देखने वालों को सलाम,
खरिदार को सलाम,
खरीदने का इशारा करनेवाले दल्ले को सलाम,
सलाम भाई, सब को सलाम !
गुस्से से फटी आंख को सलाम,
सिन्दुर लगे पथ्थर को सलाम,
लाखों खर्च कर बने मंदिर को सलाम,
मंदिर में बसी देवी को सलाम,
धर्म और देव के कोंट्रेक्टर को सलामा,
खाली हाथ से भस्म निकालने वाले को सलाम,
हवा से अंगुठी निकालने वाले को सलाम,
शनि को सलाम,
मंगल को सलाम,
भय के हरेक कोंट्रेक्टर को सलाम,
मां को हर दिन आंख दिखाने वाले बाप को सलाम,
बाप को डांटते साहब को सलाम,
साहब को घुरते उस के बोस को सलाम,
सलाम, प्यारे भाईओ सब को सलाम !
जीस के हाथमें हो अखबार उसे सलाम,
भाषण और सभा के फोटो के साथ रिपोर्ट करे उसे सलाम,
अखबार के मालिक को सलाम,
उस की लगाम पकडने वाले राज्यकर्ता को सलाम,
जीस के सामने माईक्रोफोन उसे सलाम,
उस से अविरत बोलनेवाले को सलाम,
लाखों की गिर्दी को सलाम,
गिर्दी को बहलाते जादुगर को सलाम,
नाके पर खडे टपोरी को सलाम,
हाथ-भट्टी वाले को सलाम, —-(देसी दारु बनानेवाला)
स्मगलर को सलाम,
मटकेवाले को सलाम,
उसने दिए हप्ते को सलाम,
लोकशाही को सलाम,
ठोकशाही को सलाम,
सात्ता के ट्रक ड्राईवर को सलाम,
ट्रक के निचे कुचले कुत्ते को सलाम,
कालेबाजारिये को सलाम,
जीस के हाथमें चाकु उसे सलाम,
बम्ब फोडते आतंकी को सलाम,
बम्ब और शस्त्र के व्यापारी को सलाम,
उसे फांसी की घोषणा करने वाले को सलाम,
गटर के पानी से इन्जेक्शन भरने वाले को सलाम,
अर्थि का सामान बेचने वाले को सलाम,
अर्थि उठाने वाले कंधे को सलाम,
मौत को सस्ता करने वाले सब को सलाम,
सलाम प्यारे दोस्तो, सबको सलाम !
बिल को सलाम,
बिलमें घुसे चुहे को सलाम,
खटिये के खटमल को सलाम,
दरार वाली दिवार को सलाम,
बिमार-सी पत्नि को सलाम,
देढ खोली मे खेलते बच्चों को सलाम,
रेलमें कुलबुलाती भीड को सलाम,
सडे हुए अन्न के दाने को सलाम,
फटे हुए पिले बनियान को सलाम,
धंधे के मालिक को सलाम,
युनियन के लिडर को सलाम,
हडताल को सलाम,
अनशन को सलाम,
सभी रंग के सभी झंडे को सलाम,
बस्ति बस्ति के पाखनों में भरे मल को सलाम,
गरदन पकडते हर हाथ को सलाम,
सलाम, भाई और बहनो, सब को सलाम,
मेरे परम पवित्र देश को सलाम,
देश की सु-उद्दात, सु-मंगल, सु-परंपरा को सलाम,
सर्व उस्तादी घोषणा को सलाम,
जातिभेद के कुडेदान को सलाम,
ईस कुडेदान से अंकुरित सत्ताधिश को सलाम,
उपनिषद और वेदों को सलाम,
शक्कर के कारखाने के दादाओं को सलाम,
चुनाव को सलाम,
चुनाव फंड को सलाम,
अद्रष्य उठे पंजे को सलाम,
मत के अंधे ठप्पे को सलाम,
खरगोश हाथ लिए शिकारी को सलाम,
तहनात मे लगे भाडे के सैनिक को सलाम,
दलितों पर अत्याचार करने वालों को सलाम,
इस बातमी पढनेवाले सर्व षंढों को सलाम,
सत्ता संपत्तिवाले भडवों का देश कहुं,
तो माथा फोड देन्गे,
हलकट लाचारों का देश कहुं,
तो रास्ते पर पिटाई करेन्गे,
बिके हुओं का देश कहुं,
तो रास्ता रोकेन्गे,
नेता के बारेमें कराब बोलुं,
तो नाके पे पकड कर ठोकेन्गे,
शोषण करने वालों का देश कहुं,
तो नौकरी से निकालेन्गे,
इस लिए मेरी नपुंसकता को सलाम,
मारपीट करते सर्व हाथ को सलाम,
बाकायदा, उस के बाद ही,
मेरे इस पवित्र, उद्दात्त सुमंगल देश को सलाम,
हाथ अनेक होते तो,
अनेक हाथ से की होती सलाम,
हाथ तो दो ही थे,
और उसमें भी एक हाथ,
लात के भय से कुल्हे पर था,
इस लिए ही एक हाथ से ही सलाम,
सलाम, सब को सलाम,
भाईयो और बहने सब को सलाम ।
मै तो अनपढ था, मै तो भोला था,
अज्ञानता कमजोरी से से कर बैठा सलाम,
बच्चे तुम पढे हो, कमजोरी से दूर हो,
उपर की लिस्ट जानते हो, अंदर की बात भी जानते हो,
सलाम के बदले, लात मारना जानते हो,
सलाम का जो लिस्ट है, तेरे लिए इंधन है,
तेरे पैर की लात, विकास का इन्जन है ।
मंगेश पडगांवकर । ( ऍडिशन के साथ । मंगेश भाउ, समय की मांग है अन्यथा मत लेना ।  )



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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

akraktale के द्वारा
23/02/2013

भाई भरोडिया जी सादर, एक कविता देखकर लगा था की क्या आप भी कवि हो गए किन्तु अंत में मंगेश जी का नाम देखकर समझ आया आपने इनकी रचना में कुछ बदलाव कर प्रस्तुत किया है. बहुत उम्दा. आपको और आदरणीय मंगेश जी को बधाई.

    bharodiya के द्वारा
    23/02/2013

    नमस्कार अशोकभाई मंगेश भाउ को कभी पढा नही, वो मराठी कवि है । लेकिन इस कविता से लगता है वो बहुत ज्ञानी है । सलाम वाली बात उन की है और लात वाली बात मेरी है । बाकी कोइ फरक नही है । मुझे लगता है कविता लिखना आसान है, कोइ प्रास की जरूरत नही, लय की जरूरत नही, बस, बात में दम होना चाहिए । लेकिन बात कवियों तक ही जाती हैं, कविता न समजने वालों के सर के उपर से चली जाती है । जैसे मेरे साथ होता है, पूरी बात समजमें नही आती ।

Sushma Gupta के द्वारा
22/02/2013

क्या बात है ,भदोरिया जी , आपकी व्यंगात्मक इस रोचक व् रचनात्मक शैली को सलाम …आपने देश की तमाम अनियमितताओं की ओर सबका ध्यान खींचने की जो कोशिश की है ,बह इस रचना को सार्थक बनाती है, साभार …

    bharodiya के द्वारा
    23/02/2013

    सुष्मा बहन नमस्कार धन्यवाद आप का ।


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