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निर्यात लोकशाही का

Posted On: 19 Mar, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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अमरिकी प्रजा अपनी सरकार से सवाल करती रहती है क्यों हम अरबों का खर्चा कर के दुसरे देशों में डेमोक्रसी एक्स्पोर्ट कर रहे हैं ?

खूद अमरिकी प्रजा का एक हिस्सा गरीबी के कारण भूखा रह जाता है और दुनिया के देशों में सरकार धन लुटाये तो जनता सवाल तो करेगी ।

लेकिन अमरिकाने अपनी प्रजा से ज्यादा सुख शान्तिमें जीनेवाली प्रजा का देश लिबिया बिखेर दिया लोकशाही के नाम पर । ताना शाही होते हुए भी लोग सुखी थे, ऐसा सुख लोकशाही वाला भारत तो सपने में भी नही पा सकता ।

वहां की भोली प्रजा को मिडिया मेनेजमेन्ट और अपने खडे किए गये प्यादों की मदद से वहां की जनता को बदलाव का चस्का लगा दिया । गद्दाफी सब कुछ जनता को देता था बदलाब नही देता था । और जनता के पास सब कुछ था, बदलाव के सिवा और कुछ नही चाहिए था ।

ghaddafi

आगे की बात डा. अंजना तिवारी का अपना खूद का अनुभव है ।
भोपाल। फरवरी 2011

पूरे लीबिया में फैले असंतोष और धमाकों के बीच कहीं कोई लूटपाट या अभद्रता नहीं हुई, आम लोगों के भरोसे पूरी तरह महफूज थे भारतीय। लीबिया से हाल ही में लौटी डॉ. अंजना तिवारी ने बताएं वहां के हालात।

में इजिप्ट में फैली बदलाव की आग से लीबिया में भी विद्रोह लपटें भड़क गईं। शुरु में जब मैंने अशांति की बातें सुनी तो इन्हें कोरी अफवाह समझा क्योंकि अब तक लीबिया में रहते-रहते मुझे 3 साल से अधिक हो चुके थे और मैंने वहां के लोगों को बेहद सुकून में रहते देखा था। फरवरी के आखिर तक मैंने बेंगाजी की सड़कों पर हजारों लोगों को हाथों में हथियार लिए विरोध के नारे बुलंद करते हुए देखा तो खुद को यह यकीन दिलाना पड़ा कि अब हालात पहले जैसे नहीं रहे। मार्च की शुरुआत तक तो भूमध्य सागर के किनारे बसा यह खूबसूरत देश पूरी तरह सुलग उठा। बदलाव की चिंगारी को दबाने के कर्नल गद्दाफी के प्रयासों ने इसे और ज्यादा भड़का दिया था और जब मैं वापस भारत लौट रही थी। मेरे मन में बस एक ही सवाल उठ रहा था इस बेहद खूबसूरत देश ऐसा कहर क्यों बरपा है। इस देश में जहां न खाने की दिक्कत है न रहने की कोई समस्या। जहां के लोग शायद दुनिया के सबसे भोले लोगों में से एक हैं। जहां आप रात में भी हजारों दीनार लेकर अकेले घर आ सकते हैं। जहां के लोग अपने मेहमान को बड़ा ऊंचा दर्जा देते हैं, आखिर उस देश में ऐसा क्यों हो रहा है?

आप के लिए जान पर खेल जाएंगे हम …

फरवरी के अंतिम सप्ताह में हमने लीबिया छोड़ने की तैयारी शुरु की। स्थानीय परिचित लोगों ने हमे रोकने का हरसंभव प्रयास किया। वो बार-बार यही कहते रहे कि आप लोगों को कोई खतरा नहीं होगा। हम अपने भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं लेकिन अपनी जान पर खेलकर भी आपकी हिफाजत करेंगे। वो बार-बार कहते कि आपकी सरकार वापस बुला रही है तो चले जाइये लेकिन हम चाहते हैं कि आप लोग यहीं रहे।
28 फरवरी की शाम को जब हम लीबिया छोड़ रहे थे तो वहां के लोगों की आंखे नम थी। मेरे साथी स्थानीय प्रोफेसरों और शिक्षकों ने लीबिया में जो हुआ उसके लिए माफी मांगी और यह विश्वास जताया कि जल्द ही सबकुछ सामान्य हो जाएगा। लेकिन बेहद बेमन से अपने दोनों बच्चों के साथ उसी शाम मैं जितना हो सकता था सामान लेकर जहाज पर चढ़ी। जहाज पर हम सभी के पास अपनी कमाई थी, कीमती चीजों थीं लेकिन लूटमार तो दूर, किसी ने पूछा भी नहीं कि आप क्या ले जा रहे हैं। भारत सरकार ने वापसी के लिए अच्छा इंतजाम किया था। हम एक मार्च की सुबह बेंगाजी से इजिप्ट के एलेक्जेंड्रिया के लिए चले। ढाई दिन बाद एलेक्जेंड्रिया पहुंचे। चार मार्च को एयरइंडिया की फ्लाइट की हमें दिल्ली ले आई। मैं वापस हिंदुस्तान पहुंच चुकी थी। मैं उस खूबसूरत देश को जलता छोड़ आई थी जहां मेरे ढेर सारे छात्र भविष्य में चमकने की तैयारी कर रहे थे। लौटते वक्त मुझे उनकी चिंता थी। वहां के भोले-भाले लोगों की चिंता थी। जो शायद दुनियादारी के लिए जरूरी उतना कपट नहीं जानते। आज जब हिंदुस्तान में मैं लीबिया पर पश्चिमी सेनाओं के हमले के बारे में पढ़ती हूं तो बस यही ख्याल आता है कि वहां के लोग मानवाधिकारों के नाम पर किए जा रहे इन हमलों की अंतर्कथा को उसी शिद्दत से समझ पा रहे होंगे। बस यही दुआ है कि यह खूबसूरत देश बर्बाद न हो। लोगों में वही जिंदादिली बरकरार रहे।

धमाके होते रहे पर कभी नहीं लगा डर…

मैं बेंगाजी के पॉश इलाके में पांचवी मंजिल पर किराए के मकान में रहती थी। मैंने और मेरे दोनों बच्चों ने बेंगाजी की सड़कों पर गुजरते गद्दाफी की सेनाओं के टैंकों को अपनी बालकनी से देखा। हम पूरे दिन विरोध प्रदर्शन देखते रहे। हमने देखा कि गद्दाफी के सैनिक विद्रोहियों को प्यार से मनाने का प्रयास कर रहे थे। शुरू में उन्होंने समझाने की कोशिशें की लेकिन बाद में वो हिंसक हो गए। हमने गोलियों की गूंज सुनी। फिर धमाकों की आवाजें सुनी लेकिन कभी डर नहीं लगा। क्योंकि मेरी मकान मालकिन हमेशा यह विश्वास दिलाती थी कि वो अपनी जान की बाजी लगाकर भी हमें कुछ नहीं होने देंगी। संघर्ष के दिनों में स्थानीय लोग हमेशा मदद को तैयार थे। जब हवाई हमले हो रहे थे तब मुझसे बार-बार कहा जा रहा था कि मैं बच्चों के साथ नीचे वाले फ्लैट में शिफ्ट हो जाऊं। यह उनका भरोसा ही था कि गोलियों और धमाके के बीच भी मैं हम खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे थे।

सिर्फ बदलाव के लिए विद्रोह…

लीबिया में रहते हुए मैंने कभी भी गद्दाफी के विरोध में कुछ नहीं सुना। इसके दो बड़े कारण हैं एक तो यह कि गद्दाफी बेहद शक्तिशाली हैं और उन्होंने कभी अपने खिलाफ किसी आवाज को उठने ही नहीं दिया और दूसरी यह कि वहां के लोगों की कोई भी ऐसी आवश्यकता नहीं है जिसे सरकार पूरा न करती हो। घर, खाना, पढ़ाई, स्वास्थ्य सेवाओं के साथ ही सरकार देश की आय का एक निश्चित हिस्सा लोगों में बांटती हैं। यहां के लोगों को किसी भी चीज की कमी नहीं थी। लेकिन जब विद्रोह हुआ तो उसके समर्थन में आवाजें उठने लगीं। लीबिया के लोगों ने कभी भी लोकतांत्रिक आजादी को महसूस नहीं किया था। वो खुलकर बोल नहीं सकते थे। गद्दाफी जो फैसला लेते वो सबको स्वीकार करना होता। मैंने बेंगाजी की दीवारों पर बदलाव के नारे लिखे देखे। विद्रोह और उसका समर्थन कर रहे लोगों ने विद्रोह की सिर्फ एक ही बड़ी वजह बताई और वो यह थी कि लोग अब बदलाव चाहते थे। वो सरकारी फैसलों में खुद को शामिल करना चाहते थे। वो गद्दाफी के फैसलों को मानने के बजाए अपनी बात भी रखना चाहते थे। वो अपने हुक्मरानों को चुनने का अधिकार चाहते थे। बदलाव की चाहत ही वहां के लोगों के विद्रोह की बड़ी वजह थी। जो लोग पहले खामोश थे उन्होंने भी विद्रोह की आवाज में सुर मिला लिया था। मेरी मकान मालिक की बेटी जिसे मैंने कभी भी गद्दाफी के खिलाफ बोलते नहीं सुना था वो भी अब विद्रोहियों के समर्थन में बातें कर रही थी।

मॉडर्न मुस्लिम राष्ट्र है लीबिया…

लगभग तीन बरस पहले जब मैं यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के लिए लीबिया जा रही थी तो मेरे मन में यही डर था कि यह एक रूढ़िवादी मुस्लिम देश होगा, जहां महिलाओं को घरों में कैद रखा जाता होगा। लेकिन जब में वहां पहुंची तो स्थिति को बिल्कुल ही अलग पाया। लीबिया में महिलाएं पुरुषों से समान आजाद हैं। बैंकों, अस्पतालों, क़ॉलेजों में काम करने वाले कर्मचारियों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से कहीं ज्यादा हैं। शायद ही कोई काम ऐसा होगा जिसमें महिलाएं सेवाएं न देती हों। बस इतना सा फर्क है कि वो जहां भी होती हैं पर्दे का ख्याल रखती हैं। वो बुर्के में बंद नहीं रहती, सिर पर स्कार्फ बांधती हैं। किसी भी अन्य मुस्लिम राष्ट्र की तरह यहां भी महिलाएं पुरुषों से दूरी बनाए रखती हैं। लेकिन वो घर में कैद नहीं रहती। वो देश को चलाने में बराबरी से योगदान देती हैं।

कबीलों में बंटा हैं लीबिया…

लीबिया का समाज कई कबीलों में बंटा है जिसमें सबसे ताकतवर कबीला गद्दाफी का है। 1969 में लीबिया के शासन पर कब्जे के बाद से ही गद्दाफी ने तमाम महत्वपूर्ण पदों पर अपने कबीलें के लोगों की भर्ती की। गद्दाफी का कबीला ताकतवर होता गया। गद्दाफी के कबीले की बढ़ती ताकत बाकी कबीलों में असंतोष पैदा करने लगी लेकिन गद्दाफी ने देश को इस तरह से शासित किया कि किसी ने भी उनके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश नहीं की। यहां तक कि गद्दाफी ने देश की सेना को भी कमजोर ही रखा और सुरक्षा की कमान अपने कबीले के लोगों के हाथ में दी। विद्रोह का मुख्य कारण अन्य कबीलों के लोगों में व्याप्त असंतोष ही है।

बेहद खूबसूरत देश है लीबिया…

आमतौर पर लीबिया को रेगिस्तान समझा जाता है। लीबिया का एक बड़ा इलाका रेगिस्तान ही है लेकिन ज्यादातर आबादी शहरों में रहती है। बेंगाजी और त्रिपोली में ही लगभग आधी आबादी रहती है। यहां का मौसम बेहद खुशनुमा है। सर्दियां जनवरी के दूसरे पखवाड़े में शुरु होती हैं और फरवरी का अंत आते-आते चली जाती हैं। गर्मी कभी भी इतनी नहीं पड़ती की पंखा चलाना पड़े। साल के 12 महिने रातों में हल्की सर्दी पड़ती है और आप बिना चादर ओढ़े नहीं सो सकते। लीबिया के शहरों को नए तरीके से बसाया गया है। सबकुछ बेहद व्यवस्थित है। लीबिया में आपको ऐसा नहीं लगता कि आप अफ्रीका में हैं।

बिलकुल नहीं होते हैं अपराध…

लीबिया के लोगों में एक चीज है जो समान रूप से पाई जाती हैं और वो हैं उनका भोलापन। आप कहीं भी जाइये आपको बेहद सच्चे, सीधे और सरल लोग मिलेंगे। वो कोई दिखावा नहीं करते हैं। पड़ोसी भी पड़ोसियों की बुराई नहीं करते। अपराध की दर वहां जीरो फीसदी से भी कम है। दो सालों में मैंने लूटमार की कोई वारदात नहीं सुनी। मैं अमेरिका, ब्रिटेन, मिस्त्र, जार्डन और दुनिया के अन्य कई मुल्कों में गई हूं लेकिन लीबिया जैसे सरल और भोले लोग मैंने कहीं नहीं देखे।

भारतीयों का करते हैं बेहद सम्मान…

लीबिया में भारत के लोगों को सम्मान की नजर से देखा जाता है। वहां अन्य मुल्कों के भी लोग हैं लेकिन जितना सम्मान भारत के डॉक्टरों और प्रोफेसरों को मिलता हैं उतना शायद कहीं के लोगों को भी नहीं मिलता। जैसे ही आप वहां के लोगों को बताते हैं कि आप भारत से हैं उनका व्यवहार बेहद सम्माननीय हो जाता है। वो मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। इंग्लिश कम ही लोग बोलते हैं लेकिन जो आपको समझते हैं वो हर संभव तरीके से आपकी मदद करते हैं। (डा. अंजना तिवारी, सर गैरयूनिस यूनिवर्सिटी बेंगाजी (लीबिया) में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)

———————————————————————————–

जब गद्दाफी अमरिकासे लड रहा था तब उस के प्रति नफरत फैलाने के लिए सारे संसार के मिडिया को उस के पिछे लगा दिया था । सच्चे जुठे समाचार से उसे राक्षस साबित कर दिया । उन की अलग भाषा के कारण वहां के किसी भी नगरिक की असली बात हम तक नही पहुंची । सोसियल साईट्स बिना कुछ जाने उस के पिछे पड गया था । हमारे फोरम में जब बात निकली तो मुझे उपर का लेख एक कोमेंट के रूपमें डालना पड ।

हमारे ब्लोगर मित्र अबोधबालक ने भी ये कोंमेंट डाला था ।

आदरणीय शाही जी ,
इन्टरनेट पर एक मेल काफी circulate हो रही है, जिसका सोर्स मुझे कन्फर्म नहीं हो पा रहा है, उसके अनुसार ये तथ्य गद्दाफी और लीबिया के baare में मिलते है:

Lesser known facts about Libya and Gaddafi :

1. There is no electricity bill in… Libya; electricity is free for all its citizens.

2. There is no interest on loans, banks in Libya are state-owned and loans given
to all its citizens at 0% interest by law.

3. Home considered a human right in Libya – Gaddafi vowed that his parents
would not get a house until everyone in Libya had a home. Gaddafi’s father has
died while him, his wife and his mother are still living in a tent.

4. All newlyweds in Libya receive $60,000 Dinar (US$ 50,000 ) by the government to buy their first apartment so to help start up the family.

5. Education and medical treatments are free in Libya. Before Gaddafi only 25%
of Libyans are literate. Today the figure is 83%.

6. Should Libyans want to take up farming career, they would receive farming
land, a farming house, equipments, seeds and Livestock to kick- start their farms – all for free.

7. If Libyans cannot find the education or medical facilities they need in Libya,
the government funds them to go abroad for it – onnot only free but they get US
$2, 300/month accommodation and car allowance.

8. In Libyan, if a Libyan buys a car, the government subsidized 50% of the price.

9. The price of petrol in Libya is $0. 14 per liter.

10. Libya has no external debt and its reserves amount to $150 billion – now
frozen globally.

11. If a Libyan is unable to get employment after graduation the state would
pay the average salary of the profession as if he or she is employed until
employment is found.

12. A portion of Libyan oil sale is, credited directly to the bank accounts of all
Libyan citizens.

13. A mother who gave birth to a child receive US $5 ,000

14. 40 loaves of bread in Libya costs $ 0.15

15. 25% of Libyans have a university degree

16. Gaddafi carried out the world’s largest irrigation project, known as the Great
Man-Made River project, to make water readily available throughout the desert
country.

अगर ये तथ्य सच है तो हमें इसे क्या समझे, क्या केवल अमेरिया और वेस्टर्न देश के पैसे और सामर्थ्य के बल पर उसे हटाया गया है, ऐसे किसी भी देश के साथ हो सकता है.
बहरहाल, मेरा भी भी गद्दाफी से कोई lagaav नहीं है, बात केवल मनुष्य की पाशविकता के बारे में हो रही है,
आपके विचार सदा ही मेरे लिए बहुमूल्य होते हैं, और आप हैं कहाँ? काफी समय से आपकी कोई पोस्ट ……….
आशा है की शीघ्र ही आप हमें…….



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4 प्रतिक्रिया

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19/03/2013

जिस तरह से अमेरिका ने लीबिया के साथ किया वह वर्चस्व की लड़ाई थी , शांति की नहीं । इस वर्चस्व के लिए ये किसी भी देश के साथ न्याय , शांति के नाम पर कुछ भी कर सकते हैं । पूरी सच्चाई यही कहती हैं । भदोरिया जी ,  अंजना जी के माध्यम से जो बातें सामने आई है उसके लिए आप बधाई के पात्र है , धन्यवाद

    bharodiya के द्वारा
    26/03/2013

    सुधीर भाई नमस्कार जब तक “लडना” नाम का क्रियापद मानव जात उपयोग करती रहेगी तब तक वर्चस्व की लडाई भी खतम नही होगी । धम्यवाद आप का ।

jlsingh के द्वारा
19/03/2013

आदरणीय भरोदिया साहब, नमस्कार! इस आलेख का तात्पर्य क्या है? क्या अमेरिका भारत में कुछ ऐसा ही करने जा रहा है? या और कुछ … कृपया समझाने की कृपा करें!

    bharodiya के द्वारा
    19/03/2013

    नमस्कार जवाहरभाई भारतमें तो पहले से ही हमारे राजनेता उस के पूतले हैं । अभी ऐसा नही करेगा । अभी जो खाना खराबी करनी है उनके पूतलों द्वारा ही की जायेगी । धर्म का खातमा, हिन्दु प्रजा का खातमा, मध्यम वर्ग का खातमा, धर्म हमेशा मध्यम वर्ग के कंधों पे चलता है, मध्यम वर्ग गुलामी भी आसानीसे स्विकारता नही । मध्यम वर्ग को खतम करने के लिए इस वर्ग की सारी आर्थिक बचत को हडपना शुरु कर दिया है मेहंगाई से । मध्यम वर्ग को लूट कर गरीबों को भीख दे के बचाते रहेंगे और धनवानों को और धनवान बना दिया जायेगा । धनवनों से उनको कभी खतरा नही होता बल्के एक तरह के साथी ही बन जाते हैं । गरीब तो है ही सब की सेवा करने के लिए । १९४६ में आजादी के ९९ साल पूरे होते हैं । राजीव दिक्षित की मानें तो १९४६ में आजादी खतम हो जाती है । ९९ साल के पट्टेमे मिली थी ये जमीन । उस समय तक भारत की भूमि उनको खाली या गुलाम नगरिकों से भरी चाहीए । वसुधैव कुटुम्बकम् पढ लिजीए । सारी बात समजाने की कोशीश की है ।


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